मकर संक्रांति पर क्यों है दही-चूड़ा खाने की परंपरा? जानिए इसका धार्मिक महत्व

मकर संक्रांति सनातन धर्म का एक प्रमुख त्योहार माना जाता है. इस दिन गंगा स्नान के साथ-साथ दान का विशेष महत्व है. 

ऐसी मान्यता है कि सूर्य देव इस दिन मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसलिए इस त्योहार को मकर संक्रांति कहा जाने लगा. 

दही-चूड़ा मकर संक्रांति के पर्व का अहम हिस्सा होता है. ये न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि इसका सेवन करने के पीछे शुभ और ऐतिहासिक कारण भी होते हैं .आइए जानते हैं कि आखिर खिचड़ी पर दही-चूड़ा खाने की परंपरा क्यों है…

चूड़ा, फाइबर और कार्बोहाइड्रेट का एक अच्छा सोर्स माना जाता है. वहीं, दही में कैल्शियम, प्रोटीन और अच्छे बैक्टीरिया मौजूद होते हैं. 

इन दोनों का मिश्रण पोषण का बैलेंस कॉम्बिनेशन है. जिससे पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है. मकर संक्रांति के पर्व को ठंड के अंत और फसल कटाई की खुशियों का प्रतीक कहा जाता है. 

इस मौसम में हमारे शरीर को पोषक तत्वों की जरूरत होती है. ऐसे में दही-चूड़ा का कॉम्बिनेशन इसे बखूबी पूरा करता है.

हिंदू धर्म में दही-चूड़ा का सफेद रंग पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक होता है. चूड़ा स्वाद को समेटे होता है और उसका कुरकुरापन व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव को दर्शाता है. 

वहीं, दही की ठंडक, मिठास और शुद्धता जीवन में खुशियों का प्रतीक है. ये नए साल में आने वाले शुभ संकेत, खुशहाली, समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करता है.