आखिर मृत व्यक्ति की नाक-कान में क्यों लगाई जाती है रुई, हैरान कर देगी वजह

सनातन धर्म में किसी व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कार किए जाते हैं. जिनमें 16वां संस्कार अंतिम संस्कार होता है.

गरुड़ पुराण में मृत्यु और मृत्यु के बाद के कर्मों और नियमों के बारे में बताया गया है. इन नियमों में एक ये भी नियम है कि अंतिम संस्कार के समय मृत व्यक्ति की नाक और कान में रुई डाला जाता है.

ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर मृत व्यक्ति की नाक-कान में क्यों रुई लगाई जाती है…

गरुड़ पुराण में मानव शरीर को नौ द्वारों का घर बताया गया है. इनमें दो आंखें, दो कान, दो नथुने, एक मुंह और दो विसर्जन अंग शामिल हैं. माना जाता है कि जब आत्मा शरीर छोड़ती है, तो वह इन्हीं मार्गों में से किसी एक से बाहर निकलती है.

अंतिम संस्कार से पहले मृत व्यक्ति के कुछ खुले अंगों में सोने का कण और तुलसी के पत्ते रख दिए जाते हैं. ये दोनों ही चीजें पवित्र हैं और तुलसी मोक्ष का रास्ता खोलती है.

नाक और कान के छिद्र बड़े होते हैं और सोने के कण और तुलसी को रोकने के लिए रुई लगाई जाती है. मान्यताओं के अनुसार, जीवात्मा का शरीर से मोह बना रहता है और मृत्यु के तुरंत बाद वो अपनी देह में फिर से प्रवेश करने की कोशिश करती है.

ऐसा न हो सके इसके लिए शरीर के खुले मार्गों को रुई से बंद किया जाता है. आत्मा की आगे की यात्रा न रुके इसके लिए नाक-कान में रुई लगाना जरूरी होता है.

मृत्यु के बाद शरीर बिना प्राण के हो जाता है. ऐसे में नकारात्मक शक्तियों से लेकर कई तरह की अशुभ ऊर्जाएं शरीर के खुले से अंगों से प्रवेश कर सकती हैं. रुई से नाक-कान और कान को बंद करके शरीर को सुरक्षित किया जाता है.

मृत्यु के बाद शरीर गलने लगता है और बैक्टीरिया तेजी से शरीर में बढ़ने लगते हैं. नाक-कान जैसे छिद्रों को रुई लगाकर बंद कर दिया जाता है. ताकि शरीर से निकलने वाले किसी भी तरल के पदार्थों और संक्रमण को कुछ हद तक रोका जा सके.