मन ही पूजा मन ही धूप, मन ही सेऊं सहज स्वरूप।।
वह अपने इस दोहे के माध्यम से यह बताते हैं कि, किसी की पूजा उसके ऊंचे पद को देख कर नहीं करना चाहिए. बल्कि उस व्यक्ति को पूजना चाहिए जो ऊंचे पद पर भले ही आसीन न हो, परंतु उसके अंदर गुण हों. समाज में गुणवान व्यक्ति ही सदैव पूज्यनीय होता है.