काशी में कब खेली जाएंगी मसाने की होली, जानिए कैसे शुरू हुई इसकी शुरुआत

होली का त्योहार दस्तक दे चुका है. इस दिन लोग अपनी सारी कड़वाहट को भूलकर एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं.

लेकिन भारत के ही एक हिस्से में चिता की राख से होली खेली जाती है. इस अनोखी होली को देखने देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी मेहमान आते हैं.

हम बात कर रहे हैं काशी की मशहूर भस्म होली के बारे में. यह होली 'मसान होली' के नाम से दुनियाभर में मशहूर है.

4 मार्च को देशभर में धुलंडी खेली जाएगी, लेकिन बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में 3 तीन पहले अद्भुत और अकल्पनीय होली खेली जाएगी.

मणिकर्णिका घाट पर चिता की भस्म से होली खेलने की यह परंपरा सदियों पुरानी है, जा‍ि इस बार 28 फरवरी को खेली जाएगी.

ऐसी मान्यता है कि काशी नगरी में चिता की राख से होली खेलने की परंपरा की शुरुआत स्वयं भगवान शिव ने की थी.

भगवान शिव अपने विवाह के बाद काशी पहुंचे, जहां सारे देवी-देवता इकट्ठा होकर खुशियां मनाएं, लेकिन इससे भूत-प्रेत, यक्ष और गंधर्व इस उत्सव से वंचित रह गए.

इसके बाद भोलेनाथ ने फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी पर मणिकर्णिका घाट पर श्मशान में अपने गणों के साथ के साथ भस्म की होली खेली थी.

काशी में मृत्यु को मोक्ष का द्वार मानते हैं. इसलिए मसान होली मृत्यु को उत्सव में बदलने का भी पर्व है.

काशी की ये अद्भुत होली संदेश देती है कि जीवन का असली रंग मृत्यु के उस पार ही तो है, जहां न कोई द्वेष है और न कोई मोह या भय.

श्मशान की राख से होली खेलना इस बात का संकेत है कि मृत्यु हमारा अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है.