मंदिर में दीया जलाते समय इन नियमों का करें पालन, वरना हो जाएगा अपशकुन

सनातन धर्म में सुबह और शाम पूजा के दौरान दीया जलाया जाता है. इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है.

हालांकि, शास्त्रों में दीया जलाने के कुछ नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करना जरूरी होता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि दीया जलाने की सही विधि क्या होती है….

सनातन धर्म में दीया दो बार जलाने का विधान हैं. एक दीपक सूर्योदय के समय जलाए और दूसरा सूर्यास्त के बाद संध्या समय में जलाएं.

दीया जलाने के लिए मिट्टी या धातु का एक दीया चुन लें. उसे अच्छे से साफ करें. मिट्टी का दीया हो तो पानी में थोड़ी देर के लिए भिगोकर दें और फिर सुखा दें.

पूजा के समय या सुबह-शाम की ज्योत के लिए दीपक में सरसों या तिल का तेल या फिर गाय का घी डालें. अब तेल में बाती भिगो  दें और बत्ती को भिगोएं और दीए में अच्छे लगा दें.

दीपक जलाने से पहले एक बात का ध्यान रखें कि दीपक टूटा-फूटा या गंदा तो नहीं है. ऐसा दीया जलाने से घर में दरिद्रता आती है.

दीपक को एक प्लेट में रखें. एक दीपक की लौ से दूसरे दीपक को न लजाएं. ऐसा करने से दोष लगता है.

दीया बीच में न बूझे इसका ध्यान रखें. इसके लिए दीया में पर्याप्त तेल या घी जरूर जालें या समय-समय पर डालते रहें.

दीया जलाते समय कुछ शक्तिशाली मंत्रों का जाप करें तो दीये की शक्ति बढ़ जाती है. आप इस मंत्र का जाप कर सकते हैं- शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा, शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते.

अगर तेल का दीपक जला रहे हैं तो इसे भगवान के बाईं ओर रखें. अगर घी का दीपक जला रहे हैं तो इसे दाईं ओर रखें. हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर दीपक को रखें. ध्यान रखें कि दीपक की लौ इन दिशाओं में ही रखें.