संत कबीर दास की जयंती पर पढ़ें ये दोहे, बदल देंगे जिंदगी जीने का तरीका

हर साल ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को को कबीर दास की जयंती मनाई जाती है. ये दिन महान संत, कवि और समाज सुधारक कबीरदास जी के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है.

संत कबीर दास की शिक्षाएं और दोहे समाज को सच्चाई, प्रेम और समानता का पाठ पढ़ाते हैं. ऐसे में आज हम आपके लिए कबीर दास जी के कुछ ख़ास दोहे लेकर आए हैं, जो आपकी जिंदगी बदल देंगे….

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय। अर्थ : गुरु और गोविंद (भगवान) दोनों एक साथ खड़े हैं। पहले किसके चरण-स्‍पर्श करें। कबीरदास जी कहते हैं, पहले गुरु को प्रणाम करूंगा क्‍योंकि उन्‍होंने ही गोविंद तक पहुंचने का मार्ग बताया है।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान। अर्थ : सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का उसे ढकने वाले खोल का।

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय अर्थ : अगर हमारा मन शीतल है, तो इस संसार में हमारा कोई बैरी नहीं हो सकता। अगर अहंकार छोड़ दें तो हर कोई हम पर दया करने को तैयार हो जाता है।

साईं इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय अर्थ : कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्‍मा तुम मुझे केवल इतना दो कि जिसमें मेरे गुजारा चल जाए। मैं भी भूखा न रहूं और अतिथि भी भूखे वापस न जाए।

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई. सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ. अर्थ : शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है। य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर. आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर . अर्थ : कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।