अमेरिकी कोर्ट से ट्रंप प्रशासन को बडा झटका, अदालत से गुरुद्वारों पर इमिग्रेशन कार्रवाई पर रोक बरकरार

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Washington: एक अमेरिकी संघीय अपील अदालत ने सिख, क्वेकर और बैपटिस्ट समुदायों से संबंधित धार्मिक स्थलों पर या उसके आसपास अधिकारियों द्वारा आव्रजन संबंधी गिरफ्तारियों पर प्रतिबंध को बरकरार रखा है. अदालत ने माना कि ट्रंप प्रशासन की नई नीति से धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम का उल्लंघन होता है और श्रद्धालुओं को डर के साये में प्रार्थना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.

निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया

अमेरिकी अपीली अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें वादी (शिकायतकर्ता) बने कुछ विशेष गुरुद्वारों, चर्चों और मीटिंगहाउसों के परिसरों में इमिग्रेशन अधिकारियों द्वारा की जाने वाली कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी. तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई के डर से प्रवासी तीर्थयात्रियों की उपस्थिति कम हो गई है, जिससे उनकी धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है.

अंतिम निर्णय आने तक पुराने सुरक्षा दिशानिर्देश रहेंगे लागू 

यह मामला कैलिफोर्निया के गुरुद्वारा साहिब वेस्ट सैक्रामेंटो, एक बैपटिस्ट फेलोशिप और छह क्वेकर संगठनों द्वारा दायर याचिका से संबंधित है. अदालत ने आदेश दिया है कि मामले में अंतिम निर्णय आने तक इन धार्मिक स्थलों पर पुराने सुरक्षा दिशानिर्देश लागू रहेंगे. इस फैसले को धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक बड़ी जीत बताया गया. जनवरी 2025 में ट्रंप प्रशासन ने पिछली बाइडेन सरकार के उस दिशानिर्देश को रद्द कर दिया था, जिसके तहत चर्च, गुरुद्वारे और स्कूल जैसे संवेदनशील धार्मिक स्थल इमिग्रेशन छापों से सुरक्षित थे.

नीति के खिलाफ दायर किया था मुकदमा 

मानवाधिकार संगठनों और धार्मिक समूहों ने इस नीति के खिलाफ मुकदमा दायर किया था. उनका तर्क था कि डर के माहौल के कारण अप्रवासी और अन्य श्रद्धालु पूजा स्थलों पर आने से कतरा रहे हैं, जिससे उनके धार्मिक अधिकारों पर सीधा असर पड़ रहा है. हालांकि यह फैसला एक राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध नहीं है, बल्कि यह उन विशिष्ट पूजा स्थलों (गुरुद्वारों और चर्चों) के लिए सुरक्षा और रोक को पुख्ता करता है जो इस कानूनी लड़ाई में शामिल थे.

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