Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की सदियो पुरानी परंपरा है. वहीं, श्राद्ध कर्म के दौरान भोजन का एक हिस्सा कौए को भी खिलाया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, कौए को पितरों का प्रतीक माना गया है. लेकिन आज के समय में शहरों में कई जगह कौए दिखाई नहीं देते. ऐसे में यदि श्राद्ध के दिन कौआ भोजन खाने न आए तो ऐसी स्थिति में पंचबलि की परंपरा के तहत दूसरे जीवों को भोजन कराया जा सकता है.
पितरों से जुड़ा माना जाता है कौआ
दरअसल, धार्मिक मान्यताओं में कौए को पितृ-दूत और यम से जुड़ा प्रतीक माना जाता है. इसी वजह से श्राद्ध के भोजन में कौए को हिस्सा देने की परंपरा है. कहा जाता है कि कौए के जरिए दिया गया भोजन पितरों तक पहुंचता है. हालांकि, यह धार्मिक आस्था और परंपरा का विषय है.
कौआ न आए तो क्या करें
ऐसे में यदि श्राद्ध के दिन कौआ दिखाई न दे या भोजन खाने न आए तो ऐसे में आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है. ज्योतषाचार्यो के मुताबिक, अगर श्राद्ध के दिन कौआ भोजन खाने न आए तो कौए के नाम से रखा गया भोग गाय या कुत्ते को खिलाया जा सकता है. धार्मिक परंपरा में गाय, कुत्ते, कौए, चींटी और देवताओं को भोजन अर्पित करने की बाात कही गई है. इसे पंचबलि भोग कहा जाता है.
पंचबलि भोग का क्या है महत्व
बता दें कि श्राद्ध कर्म में पितरों के निमित्त भोजन अर्पित करने के साथ जीव-जंतुओं को भी अन्न देने की परंपरा बताई गई है. श्राद्ध की सामान्य विधियों में पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन के साथ कौओं को भोजन कराने का भी उल्लेख मिलता है, जिसका उद्देश्य अन्न का दान और सभी जीवों के प्रति सम्मान की भावनाा से भी जोड़ा जाता है. इसलिए कौआ न मिलने पर गाय, कुत्ते या चींटियों को भोजन देना परंपरा के अनुसार एक विकल्प माना जाता है.
कौए को भोजन कराने से जुड़ी कथा
ज्योतषाचार्यो के अनुसार, एक धार्मिक कथा में बताया जाता है कि त्रेतायुग में इंद्र के पुत्र जयंत ने कौए का रूप धारण कर माता सीता को चोंच मारी थी, जिसके बाद भगवान श्रीराम ने उसे दंड दिया. वहीं, बाद में क्षमा मांगने पर कौए को वरदान मिलने की कथा कही जाती है. इसी मान्यता के आधार पर कौए को पितरों से जोड़कर देखा जाताा है.

