वॉशिंगटन आधारित ऑनलाइन प्रकाशन The National Interest में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक, अमेरिका, चीन और रूस के बीच बढ़ते तनावपूर्ण माहौल में यूरोप और कनाडा के लिए भारत के साथ संबंध मजबूत करना एक व्यवहारिक विकल्प बनकर उभर रहा है. डॉ. जियानली यांग द्वारा लिखे गए इस विश्लेषण में कहा गया है कि चीन पर निर्भरता कम करने और अमेरिका की अप्रत्याशित नीतियों से संतुलन बनाने की कोशिश में यूरोप अब भारत को रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है.
तीसरे ध्रुव के रूप में भारत की भूमिका
लेख के अनुसार, भारत के पास विशाल घरेलू बाजार और मजबूत होती उत्पादन क्षमता है, जबकि वह चीन जैसी जटिल भू-राजनीतिक चुनौतियों से अपेक्षाकृत मुक्त है, जो उसे एक स्थिर और भरोसेमंद विकल्प के रूप में स्थापित करती है. भारत न तो अमेरिका जैसा सुरक्षा सहयोगी है और न ही चीन जैसा बड़ा मैन्युफैक्चरिंग केंद्र, लेकिन तेजी से बंटती वैश्विक अर्थव्यवस्था में वह एक मजबूत तीसरे ध्रुव के रूप में उभर रहा है. लेख में बताया गया है कि कनाडा भी यूरोप जैसी स्थिति का सामना कर रहा है. कनाडा के प्रधानमंत्री Mark Carney ने चीन के साथ सावधानीपूर्वक बातचीत शुरू की है, ताकि वह अपने व्यापारिक संबंधों को विविध बना सके और केवल अमेरिका पर निर्भर न रहे.
व्यापार समझौते और बदलती वैश्विक व्यवस्था
हालांकि कनाडा और भारत के बीच पिछले कुछ वर्षों में तनाव रहा है, फिर भी कनाडा भविष्य में भारत को एक व्यावहारिक साझेदार के रूप में देख सकता है. लेख में कहा गया है कि यूरोप और भारत ने हाल ही में व्यापार समझौता किया है, अमेरिका और भारत के बीच एक फ्रेमवर्क डील बनी है और कनाडा भी उसी दिशा में आगे बढ़ सकता है. इससे एक नई वैश्विक व्यवस्था बनती दिख रही है, जिसमें भारत अटलांटिक के दोनों किनारों को जोड़ने वाला व्यापारिक, रणनीतिक और राजनीतिक सेतु बन रहा है. भारत इस भूमिका में इसलिए फिट बैठता है क्योंकि वह तेजी से अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ा रहा है और चीन से हटकर आने वाले निवेश को आकर्षित कर रहा है.
मैन्युफैक्चरिंग, सप्लाई चेन और लोकतांत्रिक ताकत
अमेरिका में बिकने वाले अधिकांश iPhone अब भारत में निर्मित हो रहे हैं, जिसे वैश्विक सप्लाई चेन में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है. इसके साथ ही भारत की अपेक्षाकृत कम श्रम लागत, सुधरती कानूनी प्रणाली, बढ़ती तकनीकी दक्षता और विशाल घरेलू बाजार उसकी प्रतिस्पर्धात्मक ताकत को मजबूत करते हैं. लेख में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत की एक अहम विशेषता उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जो चीन से उसे अलग करती है. भले ही उसकी संस्थाएं पूर्णतः आदर्श न हों, फिर भी चुनावी प्रक्रिया, न्यायपालिका और सक्रिय सिविल सोसाइटी जैसी संरचनाएं यूरोप और उत्तरी अमेरिका के साथ राजनीतिक साम्यता स्थापित करती हैं.
चुनौतियां और भारत की लचीलापन नीति
भारत की युवा, अंग्रेजी बोलने वाला कार्यबल और बढ़ती क्रय शक्ति भी उसे लंबी अवधि में आकर्षक बनाती है. चीन के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति भी उसे पश्चिमी देशों के करीब लाती है. हालांकि, रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत की संरक्षणवादी नीतियां, नौकरशाही की सुस्ती और स्वायत्तता पर जोर यूरोप और कनाडा के लिए चुनौतियां पैदा कर सकते हैं. लेकिन आज की अविश्वास और अस्थिरता से भरी वैश्विक व्यवस्था में भारत की लचीलापन—यानी सभी पक्षों से संबंध बनाए रखने की क्षमता—उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है.
बदलती अमेरिकी विदेश नीति और भारत की सेतु भूमिका
लेख में यह भी कहा गया है कि जैसे-जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump अपनी विदेश नीति की दिशा में बदलाव कर रहे हैं और पारंपरिक सहयोगी देशों के साथ मतभेद बढ़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे भारत एक अहम कड़ी के रूप में उभरता दिख रहा है. विश्लेषण के अनुसार, भारत अनजाने में ऐसी भूमिका निभा रहा है, जो विभाजित होती अटलांटिक दुनिया के बीच संतुलन और संपर्क बनाए रखने का काम कर सकती है.