सीने से लिपटा रहा ‘कलेजे का टुकड़ा’, मरकर भी जिंदा रही ममता; बरगी में मौत के तांडव का जिम्मेदार कौन?

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Bargi Dam Accident: मध्य प्रदेश के जबलपुर का वही बरगी डैम, जहां लोग सुकून और खूबसूरत नजारों की तलाश में पहुंचते हैं, गुरुवार शाम अचानक एक ऐसे मंजर में बदल गया जिसे याद कर आज भी रूह कांप उठती है. कुछ पल पहले तक जहां हंसी गूंज रही थी, वहीं अगले ही पल पानी ने सब कुछ निगल लिया.

एक तरफ डूबता हुआ क्रूज, दूसरी तरफ मदद के लिए उठते हाथ… और उसी अंधेरे पानी में एक मां अपने मासूम बच्चे को सीने से चिपकाए आखिरी सांस तक उसे बचाने की कोशिश करती रही. यह सिर्फ एक हादसा नहीं था… यह उन सपनों की जल-समाधि थी, जो कुछ घंटों पहले तक जिंदा थे.

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60 सैलानियों से भरा क्रूज और अचानक आई तबाही

दरअसल, पर्यटन विभाग का करीब 20 साल पुराना क्रूज 60 सैलानियों को लेकर सफर पर निकला था. सब कुछ सामान्य था, लेकिन अचानक आई तेज आंधी ने हालात को पल भर में बदल दिया. मौसम की इस मार के साथ ही प्रशासनिक लापरवाही ने इस सफर को मौत की यात्रा बना दिया. देखते ही देखते क्रूज 20 फीट गहरे पानी में समा गया. हादसे में अब तक 9 शव बरामद हो चुके हैं, 24 लोगों को बचा लिया गया है, जबकि 9 लोग अब भी लापता हैं. यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की टूटी हुई दुनिया हैं, जिनके अपने अब कभी वापस नहीं आएंगे.

मासूम को छाती से लगाए सिमट गई मां

इस पूरे हादसे (Bargi Dam Accident) की सबसे दर्दनाक तस्वीर मरिना मैसी और उनके 4 साल के बेटे त्रिशान की है. जब शुक्रवार सुबह रेस्क्यू टीम ने पानी के अंदर खिड़की में फंसे शवों को निकाला, तो गोताखोरों की आंखें भी नम हो गईं. मरिना ने डूबते वक्त अपने बच्चे को अपनी ही लाइफ जैकेट के भीतर समेट लिया था. उसने त्रिशान को अपने सीने से इतनी मजबूती से चिपकाया था कि मौत का क्रूर झोंका भी मां-बेटे की उस आखिरी आलिंगन को तोड़ नहीं पाया.

दोनों के शव एक-दूसरे की बाहों में जकड़े हुए मिले. दिल्ली से घूमने आए इस परिवार में पिता प्रदीप और बेटी सिया तो बच गए, लेकिन उनके कलेजे का टुकड़ा और जीवनसंगिनी लहरों की भेंट चढ़ गए. यह मंजर चीख-चीख कर कह रहा था कि मौत के सामने सिर्फ मां की ममता ही थी, जो अंत तक हार नहीं मान रही थी.

मंत्री के ‘अजीब’ बयान ने जले पर छिड़का नमक

हादसे (Bargi Dam Accident) के बाद जब प्रदेश के पर्यटन मंत्री धर्मेंद्र लोधी जबलपुर पहुंचे, तो उनका बयान संवेदनशीलता पर नमक छिड़कने जैसा था. जब उनसे सुरक्षा और डीजल बोट पर सवाल हुआ, तो उन्होंने कह दिया—
“नर्मदा में पेट्रोल-डीजल बोट पर रोक है, मुझे इसकी जानकारी ही नहीं है.” यह बयान हैरान करने वाला इसलिए है क्योंकि जिस विभाग के वे मंत्री हैं, उसी का 20 साल पुराना क्रूज वहां सरेआम चल रहा था. क्या मंत्री को वाकई नहीं पता था कि उनके विभाग का क्रूज वहां डीजल से चल रहा है या यह जवाबदेही से बचने का एक बहाना था? इस बयान ने साफ कर दिया कि सिस्टम कितना लापरवाह और जानकारी से कटा हुआ है.

लाइफ जैकेट के बावजूद काल के मुंह में समा गए

हादसे का एक और डरावना सच यह है कि जिन लोगों के शव मिले, उन्होंने लाइफ जैकेट पहन रखी थी. आमतौर पर लाइफ जैकेट इंसान को पानी के ऊपर रखती है, लेकिन यहां कहानी उलट गई. मंत्री के ही अनुसार, संभवतः क्रूज के निचले चैम्बर में पानी इतनी तेजी से भरा कि लोग लाइफ जैकेट पहने होने के बावजूद छत और खिड़कियों के बीच फंस गए. बताया जा रहा है कि जैकेट उन्हें ऊपर की ओर धकेल रही थी, लेकिन क्रूज उल्टा होने के कारण वे पानी से बाहर निकलने के बजाय छत से चिपक गए और दम घुटने से उनकी मौत हो गई. सुरक्षा उपकरण तो थे, लेकिन क्रूज की कंडोम हालत और डिजाइन उनके लिए ‘डेथ ट्रैप’ बन गया.

सवालों के घेरे में सिस्टम, जिम्मेदारी कौन लेगा?

इस पूरे हादसे ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

  • क्या 20 साल पुराने क्रूज की समय-समय पर जांच हुई थी?
  • क्या खराब मौसम के बावजूद सैलानियों को सफर पर भेजा गया?
  • क्या सुरक्षा मानकों का सही तरीके से पालन किया गया?

अब पूरा देश यही पूछ रहा है— इन मासूम जिंदगियों की मौत का जिम्मेदार कौन है?

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