भारत फिल्म फेस्टिवल: CMD उपेन्द्र राय ने फूंका चेतना का मंत्र, IIMT में बताया युवा होने का असली मतलब

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

ग्रेटर नोएडा के IIMT कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट में शुरू हुए तीन दिवसीय ‘भारत फिल्म फेस्टिवल’ में भारत एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क के सीएमडी (CMD) उपेन्द्र राय ने मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की. ‘भारत की बात सुनाता हूं’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने अपना पूरा ध्यान युवाओं की चेतना को झकझोरने और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करने पर केंद्रित रखा. उन्होंने कई प्रेरक कहानियों के जरिए युवाओं को लीक से हटकर चलने का संदेश दिया.

‘जीतने का कोई दूसरा विकल्प नहीं’

सीएमडी उपेन्द्र राय ने अपने संबोधन की शुरुआत जापान की एक बेहद प्रेरक कहानी से की. इस कहानी के जरिए उपेन्द्र राय ने युवाओं को समझाया कि “जीतने के लिए मानसिकता और आत्मविश्वास सबसे जरूरी है, हारने का विकल्प दिमाग से निकाल देना चाहिए.”

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उन्होंने बताया कि कैसे एक छोटे राज्य पर बड़े राज्य ने हमला कर दिया और सेनापति ने हार मान ली. ऐसे में एक जैन फकीर ने सेनापति की वर्दी पहनकर सैनिकों का नेतृत्व किया. रास्ते में एक मंदिर के पास रुककर उसने सैनिकों से कहा कि वह देवता से पूछकर आता है. बाहर आकर उसने एक सिक्का उछाला और कहा कि सीधा गिरा तो जीतेंगे. सिक्का सीधा गिरा और उस छोटी सी सेना ने अदम्य साहस से बड़ी सेना को हरा दिया. बाद में फकीर ने बताया कि सिक्के के दोनों तरफ एक ही पहलू था (सीधा ही था).

अतीत का गुणगान गरीबी की निशानी

CMD उपेन्द्र राय भारतीय युवाओं की मानसिकता पर प्रहार करते हुए कहा कि हम अतीतमुखी हो गए हैं. अगर कोई बार-बार अमीरी की बात करे कि हमारे पास ऐसा हुआ करता था, तो समझ लेना कि अब वह गरीब हो चुका है. जिसका पेट भरा हो, वो खाने की बात नहीं करता.

उन्होंने कहा कि भारत के पास 11,000 सालों का इतिहास है, हम विश्वगुरु थे, हमारे पास विश्वामित्र, कणाद और महर्षि रमन जैसे लोग थे. लेकिन आज हम सुई से लेकर जहाज तक आयात कर रहे हैं. आज 75 सालों बाद हमने एक तेजस एयरक्राफ्ट बनाया है. अमेरिका जो केवल 300 साल पुराना है, उसके पास 400 नोबेल विजेता हैं. हमारे युवाओं के नाम पेटेंट क्यों नहीं दर्ज होते? क्योंकि हमने नए निर्माण के बारे में सोचना बंद कर दिया है.

असली युवा कौन?

युवा होने की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने स्वामी रामतीर्थ का किस्सा सुनाया. जापान जाते समय पानी के जहाज पर एक 90 साल का बुजुर्ग सबसे कठिन चीनी भाषा (मेंडेरियन) सीख रहा था, जिसमें 1 लाख अल्फाबेट होते हैं. रामतीर्थ ने पूछा कि इस उम्र में सीखकर क्या करोगे? बुजुर्ग ने जवाब दिया- ‘सवाल इस्तेमाल करने का नहीं है, सवाल यह है कि मैं रोज सीखता हूं तो मुझे लगता है कि मैं जीवित हूं’.

CMD उपेन्द्र राय ने इस कहानी से छात्रों को समझाया कि जो इंसान जीवन में रोज एक कदम नहीं चलता, अखबार का एक नया शब्द नहीं सीखता, कबीर या तुलसी का एक दोहा नहीं पढ़ता, वह अंदर से मरा हुआ है. उम्र से कोई युवा नहीं होता, जो भविष्य की तरफ देखता है, वही असली युवा है.

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‘शायर, सिंह और सपूत की तरह लीक छोड़कर चलें’

अपने संबोधन के अंत में सीएमडी उपेन्द्र राय ने युवाओं से ‘विद्रोही चेतना’ अपनाने का आह्वान किया. उन्होंने महाकवि घाघ की प्रसिद्ध पंक्तियां उद्धृत कीं: “लीक लीक गाड़ी चले, लीक चले कपूत. लीक छाड़ि तीनों चलें, शायर, सिंह, सपूत.” उन्होंने समझाया कि जब तक युवाओं में जमाने से विद्रोह करके नया रचने की (शायर जैसी), कांटों में घुसकर शिकार करने की (सिंह जैसी) और माता-पिता का नाम रोशन करने की (सपूत जैसी) भावना नहीं आएगी, तब तक भारत नई ऊंचाइयों को नहीं छू सकता. उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन का सबसे बड़ा आधुनिक मूल्य ‘स्वतंत्रता’ है और इसका सही इस्तेमाल अपनी आत्मिक ऊंचाई बढ़ाने में करना चाहिए.

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