लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हाल ही में सदन में वापसी करते हुए कहा कि यह सदन देश के 140 करोड़ नागरिकों की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है. उन्होंने बताया कि हर सांसद अपने क्षेत्र की उम्मीदों और समस्याओं को लेकर संसद में आता है. उनकी कोशिश हमेशा रही है कि सभी सदस्य नियमों के तहत अपनी राय खुलकर रख सकें.
अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बने संसद
बिरला ने कहा कि उनका प्रयास रहा है कि संसद समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की भी आवाज बने. उन्होंने बताया कि कई ऐसे सदस्य होते हैं जो संकोच करते हैं या कम बोलते हैं, उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया ताकि वे अपनी बात सदन में रख सकें. उनके अनुसार जब सदस्य खुलकर बोलते हैं तो लोकतंत्र मजबूत होता है और सरकार की जवाबदेही भी तय होती है.
लोकतंत्र में सहमति और असहमति दोनों जरूरी
उन्होंने कहा कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र में सहमति और असहमति दोनों की परंपरा रही है. बिरला ने याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 93 में लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव का प्रावधान है और सदन ने उन्हें दूसरी बार इस जिम्मेदारी के लिए चुना है. उनका कहना था कि सदन की कार्यवाही हमेशा निष्पक्षता और नियमों के अनुसार चलनी चाहिए ताकि उसकी गरिमा बनी रहे.
अविश्वास प्रस्ताव के बाद कार्यवाही से बनाया था दूरी
ओम बिरला ने बताया कि 10 फरवरी को विपक्ष ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था. इसके बाद उन्होंने खुद को सदन की कार्यवाही से अलग कर लिया था. उन्होंने कहा कि दो दिनों की चर्चा में कई भावनाएं सामने आईं और उन्होंने सभी सदस्यों की बात गंभीरता से सुनी. उन्होंने समर्थन और आलोचना दोनों के लिए सभी सांसदों का आभार जताया.
लोकसभा अध्यक्ष का आसन एक संस्था का प्रतीक
स्पीकर ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष का आसन किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि एक संस्था और परंपरा का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि पूर्व अध्यक्षों ने सदन की मर्यादा को मजबूत किया है और वे भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे. उन्होंने सदन द्वारा जताए गए विश्वास के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि वे पूरी निष्ठा और संवैधानिक मर्यादा के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाते रहेंगे.
सदन में सभी के लिए नियम समान
नेता प्रतिपक्ष को बोलने का अवसर न मिलने के आरोपों पर बिरला ने स्पष्ट किया कि सदन में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, मंत्री या कोई भी सदस्य सभी को नियमों और प्रक्रिया के तहत ही बोलने का अधिकार है. उन्होंने कहा कि कोई भी सदस्य नियमों से ऊपर नहीं है. यहां तक कि Narendra Modi को भी सदन में वक्तव्य देने से पहले अध्यक्ष से अनुमति लेनी होती है.
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