काले या नीले रंग के अपेक्षा छत पर लगेंगे ये सोलर पैनल बनाएंगे 50% ज्यादा बिजली, जानें क्या है यह खास टेक्नोलॉजी?

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Rainbow solar panels: आज के समय में लगभग सभी के छतों पर सोलर पैनल लगे हुए दिखाई देते है, जो आमतौर पर काले या नीले रंग के होते है, ऐसे में यदि आपने सोचा है कि ये सोलर सिपंल नहीं बल्कि इंद्रधनुष कलर के हों तो क्या होगा?  दरअसल, रिसर्चर ने सोलर पैनल को अलग टेक्नोलॉजी दी है, जिसकी मदद से सोलर पैनल गर्म होने पर अपना रंग बदलता है. वहीं, इसकी सबसे खास बात ये है कि इस प्रोसेस में इसकी क्षमता पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है. यह उस समस्या को खत्म कर रहा है, जो सोलर पैनल टेक्नोलॉजी आने के समय से बनी हुई है.

अक्सर कोई भी नया गैजेट या तो दिखने में बहुत स्टाइलिश होता है या फिर काम में, लेकिन दोनों चीजें एक साथ मिलना मुश्किल होता है, लेकिन यह नई टेक्नोलॉजी अब स्टाइलिश भी है और बेहद काम की भी. बता दें कि काले सोलर पैनल की तरह ही ये पैनल भी मेटल या लकड़ी जैसे दूसरे मटीरियल की तरह भी दिख सकते हैं, जिससे लोगों को इन्हें अपनाने में कोई दिक्कत नहीं आएगी.

क्या है यह टेक्नोलॉजी?

इस टेक्नोलॉजी के पीछे एक खास तरह का केमिकल कोलेस्टेरिक लिक्विड क्रिस्टल काम करता है. यह केमिकल सूरज की रोशनी के टकराने और रिफ्लेक्ट होने के तरीके को बदल देता है, जिससे पैनल का रंग बदलता दिखाई देता है. यह तकनीक धूप का 88 करीब प्रतिशत हिस्सा सोखकर उससे बहुत ज्यादा बिजली बना सकती है. यह ना सिर्फ दिखने में सुंदर लगेगी, बल्कि रोशनी के हिसाब से अपना रंग बदलकर अधिक से अधिक धूप का सही इस्तेमाल भी करेगी. इसका मतलब साफ है कि इससे बिजली का उत्पादन भी बढ़ जाएगा.

क्यों नहीं काम आई पुरानी तकनीक

दरअसल, सोलर पैनल के ऊपर रोशनी पड़ना बहुत जरूरी है, जिससे बिजली बन सके. इसीलिए उसे सुंदर बनाने वाले पुराने तरीके काम नहीं करते थे, क्योंकि वे सूरज की रोशनी को रोक लेते थे. वही, दूसरे रंग वाले तरीकों में सिरेमिक इंक या मेटैलिक ऑक्साइड का इस्तेमाल होता है, लेकिन ये रोशनी की अलग-अलग वेवलेंथ को सोखते और फैलाते हैं, जिससे बिजली का उत्पादन कम हो जाता है.

खास कोटिंग से नहीं बर्बाद होती धूप

इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि इंजीनियरों ने शीशे या सोलर पैनल के ऊपर लगाने वाली एक ऐसी खास कांच जैसी परत कोटिंग बनाई है, जो रोशनी को बेकार में फैलने या बर्बाद होने से रोकती है. इससे सूरज की अधिक से अधिक रोशनी एक ही जगह सही से इस्तेमाल हो पाती है, जिससे थर्मोक्रोमिक सोलर सेल, रंग बदलने वाले तापमान की रेंज में अपनी लगभग 88%–91.4% क्षमता बनाए रखने में कामयाब रहते हैं.

कैसे काम करती है यह टेक्नोलॉजी?

बता दें कि इस केमिकल के बारीक कण माइक्रोस्कोपिक लेवल पर खुद-ब-खुद एक स्प्रिंग की तरह गोल-गोल आकार में ढल जाते हैं. जब सूरज की रोशनी इनसे टकराती है, तो यह रोशनी को खास तरह से रिफ्लेक्ट करते हैं, जिससे पैनल पर अलग-अलग सुंदर रंग दिखाई देते हैं. इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि जितनी रोशनी से रंग दिखता है सिर्फ उतनी ही इस्तेमाल होती है, बाकी की पूरी धूप बिना किसी रुकावट के इस लेयर के आर-पार निकल जाती है. इसी वजह से पुराने सिरेमिक इंक वाले रंगीन पैनलों की तुलना में यह नई तकनीक 50 प्रतिशत अधिक बिजली बनाने की क्षमता रखती है.

गहरे रंग के पैनलों की जगह रंग बदलने वाली सतहों का इस्तेमाल करके, शहर ऊंची इमारतों की खड़ी दीवारों को बिजली बनाने वाले सिस्टम में बदल सकते हैं और इससे इमारतों की सुंदरता पर भी कोई असर नहीं पड़ता. लैब टेस्ट से पता चलता है कि थर्मोक्रोमिक लिक्विड क्रिस्टल जैकेट सोलर पैनल की ऊर्जा बदलने की क्षमता का 88 प्रतिशत हिस्सा बनाए रखते हैं. यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जो गर्मी के हिसाब से रंग बदलती है. इसका फायदा यह है कि एक तो हमें तापमान का पता चलता रहता है और दूसरा बिजली का बनना भी प्रभावित नहीं होता.

 

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