ईरान ने कुरान की आयतों के जरिए सऊदी पर साधा निशाना, भारत रूस और चीन के लिए दिया संदेश

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Ali Khamenei Funeral: ईरान सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार कार्यक्रम का इस्तेमाल दुनिया में संदेश देने के लिए कर रहा है. दरअसल, शुक्रवार को जब पहले दिन विदेशी प्रतिनिधिमंडल तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला धार्मिक परिसर में खामेनेई को श्रद्धांजलि देने पहुंचे तो उस दौरान कुरान की अलग-अलग आयतें पढ़ी गईं, जिसे लेकर बहस छिड़ गई है. ऐसे में विश्लेषकों का तर्क है कि ईरान ने ये आयतें खास तौर पर इसलिए चुनीं, ताकि आने वाले विदेशी प्रतिनिधियों को राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश दिए जा सकें.

सऊदी अरब के लिए कुरान की खास आयत

जब सऊदी अरब के उप विदेश मंत्री वलीद बिन अब्दुल करीम, अली खामेनेई के ताबूत पर श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचे उस समय पढ़ी गई आयत ने सबसे अधिक लोगो का ध्यान खीचा. एक रिपोर्ट के अनुसार, वह आयत अल-इमरान 3:13 थी, जिसमें बद्र की लड़ाई का जिक्र है. इसमें पैगंबर मोहम्मद के अनुयायियों ने बहुत बड़ी सेना को हरा दिया था. इसका समापन इस तरह से होता है- ईश्वर जिसे चाहे अपनी मदद से सहारा देता है। निश्चित रूप से इसमें समझदार लोगों के लिए एक सबक है.” यह ईरान की अमेरिका और इजरायल की जीत तरफ इशारा था.

1400 साल पहले हुई लड़ाई की दिलाई याद

हालांकि इस आयत का सऊदी अरब से भी कनेक्शन है. बद्र की लड़ाई 624 ईस्वी में जहां लड़ी गई थी, आज वह जगह सऊदी अरब में है. ऐसे में जानकारो का कहना है कि यह आयत सऊदी अरब के लिए सीधा संदेश है. ईरान के खिलाफ युद्ध में सऊदी अरब, अमेरिका के साथ खड़ा था. अमेरिका ने उसके हवाई अड्डों का इस्तेमाल किया था. वहीं, कुछ रिपोर्ट कहती हैं कि रियाद ने ईरान पर गुप्त रूप से हमले भी किए. इस संदर्भ को देखते हुए आयत का मतलब और भी तीखा हो जाता है.

बता दें कि इस कार्यक्रम में शामिल होने वाला सऊदी अरब अकेला देश नहीं था. वह उन 30 से अधिक प्रतिनिधिमंडलों में से एक था, जो इस मौके पर अली खामेनेई को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे. इनमें भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी था, जिसका नेतृत्व सैयद अता हसनैन ने किया. वहीं सबसे खास बात ये रही कि ईरान ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल के पहुंचने पर जो आयत पढ़ी, उसकी टोन दोस्ताना था.

भारत के लिए पढ़ी गई कौन सी आयत?

भारतीय डेलीगेशन के समय जो आयत इस्तेमाल की गई, वह थी- हिम्मत न हारो और न दुखी हो. इस आयत को पहले हिजबुल्लाह के लिए इस्तेमाल किया गया था. हालांकि, भारत के लिए इसमें शहीदों और बुरे काम करने वालों के बारे में कही गई बातें शामिल नहीं थीं. यह उसी हिस्से का एक नरम रूप था.

रूस और चीन के लिए भी नरमी

भारत के अलावा रूस, चीन और मिस्र के लिए भी पाठ का लहजा शांत था. इनके पहुंचने पर पढ़ी गई आयतें लड़ाई के बजाय नेकी, तसल्ली और इनाम के बारे में थीं. हालांकि, आयोजकों ने यह नहीं बताया कि हर प्रतिनिधिमंडल के लिए अलग-अलग आयतें क्यों पढ़ी गईं, लेकिन कई ईरानी मीडिया आउटलेट ने कहा कि इन्हें जानबूझकर चुना गया था. रूढ़िवादी माने जाने वाले आउटलेट तब्नाक ने पब्लिक डिप्लोमेसी में नई पहल बताया और कहा कि आयतों को नैतिक और राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा सकता है.

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