New Delhi: आर्मेनियाई सेना भारतीय कंपनियों और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ से विकसित तोप सिस्टम के साथ अभ्यास कर रही है. इनमें 48 किलोमीटर तक मार करने वाली ATAGS और तेजी से जगह बदलकर हमला करने वाली एमएआरजी 155-बीआर शामिल हैं. डिफेंस डॉट इन की रिपोर्ट के अनुसार 2026 के मध्य में सामने आए मिलिट्री एक्सरसाइज के फुटेज में इन भारतीय तोप सिस्टम को आर्मेनियाई सेना के साथ सक्रिय रूप से इस्तेमाल करते दिखाया गया.
साझेदारों में विविधता लाने की कोशिश
यूक्रेन युद्ध के कारण रूस से सैन्य आपूर्ति में आई परेशानियों के बीच आर्मेनिया ने अपने रक्षा साझेदारों में विविधता लाने की कोशिश की है. भारत इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता के रूप में सामने आया है. रिपोर्टों के अनुसार दोनों देशों के कुल रक्षा अनुबंधों का मूल्य करीब 2 से 2.2 अरब डॉलर तक बताया गया है. भारतीय सिस्टम का आर्मेनिया के पहाड़ी और चुनौतीपूर्ण भूभाग में इस्तेमाल भारत के रक्षा उद्योग के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है.
विदेशी इस्तेमाल का अनुभव
इससे भारतीय तोपखाने और अन्य स्वदेशी सिस्टम के विदेशी इस्तेमाल का अनुभव बढ़ता है. वहीं आर्मेनिया के लिए चुनौती यह है कि इन हथियारों को सिर्फ खरीदने के बजाय उन्हें अपने सैन्य ढांचे, प्रशिक्षण और युद्धक रणनीति में प्रभावी तरीके से शामिल किया जाए. यह सिर्फ हथियार खरीदने की कहानी नहीं है. मामला इन्हें सेना की नियमित युद्धक क्षमता में शामिल करने का भी है. ATAGS को भारी और लंबी दूरी की मार के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि एमएआरजी 155-बीआर का जोर तेजी से तैनाती और फिर स्थान बदलने पर है.
लंबी दूरी से निशाना साधने की क्षमता
पहाड़ी इलाकों वाले आर्मेनिया के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है. एक तरफ लंबी दूरी से निशाना साधने की क्षमता चाहिए. दूसरी तरफ दुश्मन के ड्रोन और जवाबी तोपखाने से बचने के लिए तेजी भी चाहिए. यही वजह है कि भारतीय सिस्टम के साथ आर्मेनियाई सेना का प्रशिक्षण खास ध्यान खींच रहा है. ATAGS यानी एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम 155 मिलीमीटर और 52 कैलिबर की तोप है. इसे डीआरडीओ ने भारत फोर्ज और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स के साथ मिलकर विकसित किया है.
दूरी तय करने वाला डिजिटल सिस्टम
उपलब्ध जानकारी के अनुसार बेस-ब्लीड गोला-बारूद के इस्तेमाल से यह करीब 48 किलोमीटर तक लक्ष्य पर वार कर सकती है. आर्मेनिया में इसे स्थानीय तौर पर ‘टोर्क’ या ‘तिर’ नाम से भी जाना जाता है. इसकी एक खासियत इसका गोले की दिशा और दूरी तय करने वाला डिजिटल सिस्टम है. खरीदार देश के लिए इसमें आर्मेनियाई भाषा का इंटरफेस भी शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है. इससे सैनिकों के प्रशिक्षण और संचालन में मदद मिल सकती है.
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