पहले फ्रांस की बात
फ्रांस में पिछले हफ्ते शुरू हुआ आंदोलन पेरिस से निकलकर मॉंपीलिए, नांत और मार्सेय जैसे शहरों तक पहुंच गया. हजारों छात्र सड़कों पर उतर चुके हैं. कई जगह छात्रों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई है. ऐसे में सैकड़ों स्कूलों को सोमवार को बंद करना पड़ा है. फ्रांस के न्याय मंत्री के मुताबिक, शुक्रवार तक देश के 3,700 स्कूलों में से 735 किसी न किसी तरह के हिंसक प्रदर्शन से प्रभावित हुए थे. छात्रों की मुख्य शिकायत स्कूलों की हालत को लेकर है. उनका कहना है कि कई स्कूलों में शिक्षक कम हैं, कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा छात्र हैं और इमारतें खराब हालत में हैं.
सरकार ने अभी तक नहीं उठाए ठोस कदम
ऐसे में आयोजकों ने मंगलवार को भी प्रदर्शन जारी रखने का आह्वान किया है. उनका आरोप है कि सरकार ने अभी तक ठोस कदम नहीं उठाए हैं. वहीं, प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने कहा है कि सरकार स्कूलों में पढ़ाई जारी रखने, सुविधाएं सुधारने, स्कूल के समय को बेहतर तरीके से व्यवस्थित करने और यूनिवर्सिटी दाखिले की प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाने पर काम कर रही है. सरकार तोड़फोड़ करने वालों से नुकसान का खर्च वसूलने वाले ‘वैंडल-पेज़’ कानून की समीक्षा भी तेज कर रही है.
इस बीच शिक्षा मंत्री का आरोप है कि कुछ अति-वामपंथी कार्यकर्ताओं ने छात्र आंदोलन में घुसकर उसे हिंसक बना दिया है. इससे छात्रों और स्कूल कर्मचारियों दोनों की सुरक्षा खतरे में पड़ रही है. हालांकि इस आरोप के समर्थन में कोई स्वतंत्र सबूत नहीं दिया गया है.
जर्मनी में छात्रों का किस बात पर गुस्सा?
रिपोर्ट के मुताबिक, बर्लिन में करीब 200 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी. इस दौरान पुलिस ने कुछ समय के लिए 16 लोगों को हिरासत में लिया और 11 आपराधिक शिकायतें दर्ज कीं. इनमें संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और आपत्तिजनक व्यवहार जैसे आरोप शामिल थे. वहीं, 17 और 19 साल के दो प्रदर्शनकारियों को चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की मानहानि के आरोप में भी हिरासत में लिया गया था.
बता दें कि 25 सितंबर को करीब 100 शहरों में प्रदर्शन हुए, जिसमें 45,000 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. यह 10 महीनों में चौथा राष्ट्रव्यापी स्कूल प्रदर्शन था.