एक मौत, दो कहानियां: खामेनेई के निधन पर ईरान में जश्न भी, शोक भी — सच्चाई क्या है?

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Iran Khamenei Death News: ईरान की सड़कों पर आज ऐसा दृश्य देखने को मिल रहा है, जिस पर पहली नजर में यकीन करना मुश्किल है. लंबे समय तक सख्त माहौल और डर के साये में रहने वाला यह देश आज अचानक उत्सव के रंग में नजर आ रहा है. कई शहरों में लोग सड़कों पर उतरकर आतिशबाजी कर रहे हैं, नाच रहे हैं और गाड़ियों के हॉर्न बजाकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं. दरअसल, ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन की खबर सामने आने के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. इस अप्रत्याशित माहौल ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है.

पहली बार ‘अच्छी खबर

इस उत्साह के पीछे छिपे दर्द और भावनाओं को समझना भी उतना ही जरूरी है. तेहरान से लेकर इस्फहान तक सड़कों पर उतरे युवाओं और आम लोगों के लिए यह केवल एक नेता के निधन की खबर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के कमजोर पड़ने का संकेत है जिसे वे लंबे समय से दमन और प्रतिबंधों का प्रतीक मानते रहे हैं. उनके लिए यह पल बीते कई दशकों की निराशा, गुस्से और बदलाव की उम्मीदों का मिलाजुला रूप बनकर सामने आया है.

ईरानी पत्रकार और एक्टिविस्ट मसीह अलीनेजाद का सोशल मीडिया पर आया एक वीडियो इस पूरे माहौल को बयां करता है. वे कहती हैं कि सालों से वे हर सुबह इस खौफ के साथ उठती थीं कि उनके अपनों को मारा जा रहा है, लेकिन आज पहली बार उन्हें कोई ‘अच्छी खबर’ मिली है. वे खुशी से झूम उठीं और इसे अपने जीवन की एक नई शुरुआत मान रही हैं. यह चिल्लाने और हंसने का मौका उन लोगों के लिए है, जो लंबे समय से आजादी के लिए तड़प रहे थे.

सिक्के का दूसरा पहलू

हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही अहम है. जहां एक ओर सड़कों पर कुछ लोग जश्न मना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार समर्थकों और सरकारी मीडिया में गहरा शोक दिखाई दे रहा है. कई टीवी एंकर भावुक होकर खबरें पढ़ते नजर आए, जबकि सरकार ने 40 दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है. वहीं बड़ी संख्या में आम नागरिकों, खासकर युवाओं के लिए खामेनेई का लंबा शासन सख्ती और नियंत्रण का प्रतीक माना जाता रहा है. 2022 के ‘महिला-जीवन-आजादी’ आंदोलन से लेकर आर्थिक समस्याओं और अंतरराष्ट्रीय अलगाव तक, कई कारणों से लोगों के एक वर्ग में असंतोष बना रहा, जिसके चलते वे खुद को सत्ता से दूर और अलग-थलग महसूस करते रहे.

प्रिंस रेजा पहलवी की अपील क्या है ?

इस उथल-पुथल के बीच ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी ने भी मोर्चा संभाल लिया है. उन्होंने देश के लोगों से अपील की है कि वे इस मौके पर एकजुट हों. उनका कहना है कि अब समय आ गया है कि एक स्थिर बदलाव की ओर कदम बढ़ाया जाए ताकि एक आजाद और खुशहाल भविष्य का सपना सच हो सके. उन्होंने सरकार को चेतावनी भी दी कि किसी भी उत्तराधिकारी को थोपने की कोशिश नाकाम ही रहेगी.

तानाशाही के अंत की दबी गूंज

सड़कों पर दिख रही यह हलचल कई लोगों के लिए लंबे समय से दबे असंतोष की अभिव्यक्ति मानी जा रही है. एक ओर शोक का माहौल है, तो दूसरी ओर बदलाव की उम्मीदें भी उभरती दिखाई दे रही हैं. फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें ईरान की स्थिति पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इसे सिर्फ एक नेता के निधन से जुड़ी घटना नहीं, बल्कि संभावित राजनीतिक और सामाजिक बदलावों के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है.

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