Islamic NATO: सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ साइन कर एक ऐसा गठबंधन बनाया है, जिसके तहत अगर तीनों में से किसी एक पर हमला होता है, तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा. ऐसे में तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान ने कहा कि ‘टेक्निकली यह NATO जैसा ही है. इसी वजह से आप एक सिक्योरिटी पैक्ट बनाते हैं.’
फिदान ने बताया कि यह समझौता अचानक नहीं हुआ, बल्कि करीब 3 साल से इसकी तैयारी चल रही थी. उन्होंने कहा कि ‘पिछले 2 साल 8 महीने से मैं लगातार अपने पार्टनर्स और दूसरे देशों के साथ बातचीत में था. यह एग्रीमेंट 3 साल से तैयार किया जा रहा था.’
इस गठबंधन का हिस्सा बनेगा मिस्र
इसके अलावा, फिदान ने ये भी कहा कि ‘मिस्र हमारा प्राकृतिक साझेदार है. अगले चरण में वो भी इस गठबंधन का हिस्सा बन सकता है. उन्होंने कहा कि कुछ तकनीकी मुद्दे हैं, जैसे ही वे हल होंगे, मिस्र भी इसमें शामिल हो जाएगा.’
किस ताकत पर खड़ा है ये गठबंधन
बता दें कि इस समझौते को तीनों देशों की अलग-अलग ताकतों के मेल के तौर पर पेश किया जा रहा है. सऊदी अरब ऊर्जा संसाधनों और तकनीकी निवेश की ताकत के साथ खड़ा है. तुर्की के पास एडवांस डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और NATO की दूसरी सबसे बड़ी सेना है. वहीं पाकिस्तान अपनी परमाणु क्षमता, मिसाइल टेक्नोलॉजी और बड़ी सेना के साथ इस गठबंधन में शामिल है.
तुर्की के विदेश मंत्री ने कहा कि यह गठबंधन किसी पर हमला करने के लिए नहीं है. उन्होंने कहा कि ‘सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की की विदेश नीति विस्तारवादी नहीं है. जब ये देश साथ आते हैं, तो यह एक रक्षात्मक संगठन बनता है. जब तक किसी सदस्य पर हमला नहीं होता, यह किसी देश से टकराव नहीं करेगा.’
नाटो जैसा क्यों नहीं माना जा रहा?
बता दें कि यह भले ही NATO जैसा बताया जा रहा है, लेकिन इसमें NATO की तरह कोई स्पष्ट सैन्य कमांड स्ट्रक्चर या ऑपरेशनल डिटेल सामने नहीं आई है. इसके अलावा, यह समझौता ऐसे समय पर हुआ है, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध चल रहा है और पश्चिम एशिया के देश अब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका के अलावा दूसरे देशों की ओर देख रहे हैं. ऐसे में सऊदी अरब इस नए गठबंधन के जरिए अपनी सुरक्षा को अमेरिका पर निर्भरता से थोड़ा अलग करने की कोशिश कर रहा है.