Islamabad: पाकिस्तान की राजनीति में फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के बढते अधिकारों पर देश के मौलाना फ़ज़लुर रहमान ने उन्हे खुली चुनौती दी है. 69 वर्षीय मौलवी ‘जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फ़ज़ल’ (JUI-F) के प्रमुख हैं जो पाकिस्तान की सबसे बड़ी धार्मिक-राजनीतिक पार्टियों में से एक है. उन्होंने देश के जटिल नागरिक-सैन्य संबंधों के बीच तीन दशकों से ज़्यादा का समय बिताया है.
गठबंधन सरकारें बनाने में मदद
उन्होंने संसद में काम किया है गठबंधन सरकारें बनाने में मदद की है और सेना प्रमुखों के साथ अच्छे कामकाजी संबंध बनाए रखे हैं. अक्सर पाकिस्तान के ‘माहिर राजनीतिक खिलाड़ी’ (पॉलिटिकल सर्वाइवर) के तौर पर पहचाने जाने वाले रहमान ने आमतौर पर टकराव के बजाय बातचीत को प्राथमिकता दी है. इसलिए फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को खुलकर चुनौती देने का उनका फैसला एक बड़ा बदलाव है.
राजनीतिक अधिकार पर सवाल
जब कोई अनुभवी अंदरूनी व्यक्ति सेना के राजनीतिक अधिकार पर सवाल उठाता है तो पाकिस्तान के सत्ता-तंत्र (एस्टेब्लिशमेंट) को उस पर ध्यान देना ही पड़ता है. पाकिस्तान के करीब 80 साल के इतिहास में एक कड़वा सच हमेशा कायम रहा है. सरकारें आती-जाती रहती हैं लेकिन सत्ता की असली चाबी हमेशा वहां की सेना (एस्टेब्लिशमेंट) के पास ही रहती है. देश में प्रधानमंत्री चुने गए, हटाए गए, जेल भेजे गए और मुल्क से बाहर तक निकाले गए लेकिन सेना का दबदबा कभी कम नहीं हुआ.
सेना ही सत्ता की असली निर्णायक बनी
राजनीतिक पार्टियां बनीं और खत्म हुईं. फिर भी इन सबके बीच सेना ही सत्ता की असली निर्णायक बनी रही. चाहे तख्तापलट के ज़रिए सीधे शासन किया हो या पर्दे के पीछे से भारी असर डाला हो. यही वजह है कि मौलाना फ़ज़लुर रहमान की पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ हालिया टक्कर आम विपक्षी राजनीति से कहीं ज़्यादा अहम मानी जा रही है. रहमान का तर्क था कि इस प्रयोग को दोहराने से पाकिस्तान के अंदरूनी झगड़े और बढ़ेंगे.
ज़िम्मेदारी आम नागरिकों की नहीं
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सरकार की ज़िम्मेदारी है आम नागरिकों की नहीं. नागरिकों से हथियार उठाने के लिए कहने से पीढ़ियों तक चलने वाली खून-खराबे की दुश्मनी और अराजकता पैदा होगी. साथ ही यह संकेत भी जाएगा कि सरकार अपना सबसे बुनियादी कर्तव्य निभाने में भी नाकाम रही है.
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