US Execution: अमेरिका में खूंखार अपराधों के लिए मिलने वालीं मौत की सजाएं फिर कुछ कारणों से सुर्खियों में हैं. पहला- क्रिस्टा पाइक नाम की एक अमेरिकी महिला, जिसे मौत की सजा सुनाई गई है, लेकिन वह जहर वाला इंजेक्शन लगाए जाने के बाद भी बच गई और अब उसकी हालत बुरी हो रही है. वहीं दूसरा- राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सेना के साइकेट्रिस्ट निदाल हसन को गोली मारकर (फायरिंग स्क्वाड) मौत की सजा देने की मंजूरी दे दी है. हसन ने साल 2009 में एक मिलिट्री बेस पर 13 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी थी.
आपको बता दें कि अमेरिका में भारत की तरह फांसी पर लटकाकर मौत की सजा नहीं दी जाती, बल्कि अलग अलग तरीकों से दी जाती है, तो चलिए जानते है उन तरीकों के बारे में…..
फांसी पर लटाकना
आज दुनिया भर में फांसी पर लटकाना मौत की सजा देना का सबसे कॉमन तरीका माना जाता है लेकिन अमेरिका में नहीं. दरअसल, 1890 के दशक तक अमेरिका में भी फांसी देना ही सजा-ए-मौत का मुख्य तरीका था. लेकिन अब अमेरिका ने इसे छोड़ ही दिया है क्योंकि इसे क्रूर और असामान्य सजा माना जाता था. इसमें प्रक्रिया के तहत अमेरिका में आखिरी बार फांसी 25 जनवरी 1996 को डेलावेयर में दी गई थी.
19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी में, अमेरिका के राज्यों ने मौत की सजा के लिए ऐसे तरीकों की तलाश की जो मेडिकल प्रक्रिया जैसे लगें. जैसे-बिजली का झटका देना, जानलेवा इंजेक्शन लगाना आदि तरीकों को अपनाया गया, क्योंकि ये ज्यादा व्यवस्थित, साफ-सुथरे और वैज्ञानिक रूप से कंट्रोल्ड लगते थे.
घातक इंजेक्शन
अमेरिका में आज के वक्त अधिकतर मौत की सजा जहरीला इंजेक्शन देकर ही दी जाती है. 1976 के बाद से अबतक अमेरिका में 1492 अपराधियों को इस तरीके से मौत की सजा मिली है. बता दें कि हाल ही में 50 साल की पाइक लंबे इंतजार के बाद मौत की सजा दी जानी थी. लेकिन जहरीला इंजेक्शन देने के बाद भी वह बच गई और तो और उसकी हालत भी गंभीर हो गई हैं, जिसका अस्पताल में इलाज चल रहा है. दरअसल, आज, अमेरिका के जिन भी राज्यों में मौत की सजा का प्रावधान है, वे सभी इसी तरीके का इस्तेमाल करते हैं. इसे ही प्रॉयरिटी दी जाती है.
फायरिंग स्क्वाड
फायरिंग स्क्वाड से सजा-ए-मौत देने के लिए, कैदी को कुर्सी पर चमड़े की पट्टियों से कमर और सिर के पास बांधा जाता है. कैदी के सिर पर एक काला हुड पहनाया जाता है. वहीं, एक डॉक्टर स्टेथोस्कोप से कैदी के दिल की जगह का पता लगाता है और उसके ऊपर गोल सफेद कपड़े का निशाना लगाता है. 20 फीट दूर एक घेरे में खड़े पांच निशानेबाजों के पास .30 कैलिबर की राइफलें होती हैं जिनमें एक-एक गोली भरी होती है. निशानेबाजों में से एक को खाली कारतूस (ब्लैंक राउंड) दिए जाते हैं. किसी को पता नहीं होता कि किसके राइफल खाली है. खाली कारतूस इसलिए ताकि स्क्वाड का हर सदस्य यह मान सकता है कि हो सकता है कि कैदी की जान लेने वाली गोली उसने न चलाई हो. 1976 के बाद से अबतक अमेरिका में 6 लोगों को इस तरीके से मौत की सजा दी गई है.
इलेक्ट्रिक चेयर पर बैठाकर बिजली के झटके
वही, न्यूयॉर्क ने 1888 में पहली इलेक्ट्रिक चेयर बनाई और 1890 में विलियम केमलर को मौत की सजा दी. जल्द ही, अमेरिका के दूसरे राज्यों ने भी मौत की सजा देने का यह तरीका अपना लिया. आज, किसी भी राज्य में मौत की सजा देने के लिए सिर्फ इलेक्ट्रिक चेयर का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. हालांकि कुछ राज्य इसे तब भी इस्तेमाल करते हैं जब कैदी इसे चुनता है या जब जानलेवा इंजेक्शन नहीं दिया जा सकता.
इसमें 500 से 2000 वोल्ट का झटका दिया जाता है, जो लगभग 30 सेकंड तक रहता है. करंट फिर बंद कर दिया जाता है. डॉक्टर शरीर के शांत होने का कुछ सेकंड इंतजार करते हैं और फिर देखते हैं कि कैदी का दिल अभी भी धड़क रहा है या नहीं. अगर धड़क रहा होता है, तो एक और झटका दिया जाता है. यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कैदी की मौत न हो जाए.
गैस चेंबर
1924 में, अमेरिका के नेवादा राज्य ने कैदियों को मौत की सजा देने का ज्यादा मानवीय तरीका अपनाया और साइनाइड गैस का इस्तेमाल शुरू किया. जी जॉन वह पहले व्यक्ति थे जिन्हें जहरीली गैस से मौत की सजा दी गई थी. अमेरिका में गैस चैंबर का आखिरी बार इस्तेमाल 1999 में हुआ था.आज 11 राज्यों में मौत की सजा देने के लिए जहरीली गैस का इस्तेमाल करने की मंजूरी है, लेकिन सभी राज्यों में मुख्य तरीका जहरीला इंजेक्शन ही है.