New Delhi: बीते कुछ सालों में कई देशों ने अमेरिका के असर या दबाव में अपनी न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं को या तो रोक दिया या फिर छोड़ दिया. ऐसे में ईरान ने भी अमेरिका के साथ ओमान में परमाणु पर बातचीत करने पर सहमति जताई है. बताते चलें कि चाहे डिप्लोमेसी हो, बैन हो, इंस्पेक्शन हो या फिर मिलिट्री प्रेशर हो यूनाइटेड स्टेट्स ने कई इलाकों में न्यूक्लियर वेपंस प्रोग्राम को प्रभावित करने या फिर खत्म करने में एक बड़ी भूमिका निभाई है.
लीबिया, इराक आदि देश पहले से ही शामिल
22 जून 2025 को यूनाइटेड स्टेट्स ने कथित तौर पर ईरान की खास न्यूक्लियर फैसिलिटी पर हमले किए थे. ईरान अकेला नहीं है. इस लिस्ट में लीबिया, साउथ अफ्रीका, यूक्रेन, कजाकिस्तान, बेलारूस और इराक आदि देश पहले से ही शामिल हैं. जून 2025 में यूनाइटेड स्टेट्स में स्थित तौर पर फोर्डो, नतांज और इस्फहान में न्यूक्लियर फैसिलिटी को टारगेट करते हुए एक मिलिट्री ऑपरेशन को शुरू किया.
प्रोग्राम से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान
इस ऑपरेशन को ऑपरेशन मिडनाइट हैमर कहा गया. इसका मकसद ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाना था. यूनाइटेड स्टेट्स के असेसमेंट के मुताबिक इन हमलों ने ईरान की एनरिचमेंट कैपेबिलिटी को काफी पीछे धकेल दिया. यह कदम ईरान के न्यूक्लियर इरादों को लेकर सालों तक चले बैन, बातचीत और तनाव के बाद उठाया.
लीबिया प्रोग्राम को खत्म करने के लिए राजी
2003 में मुअम्मर गद्दाफी के लीडरशिप में लीबिया अपनी मर्जी से ही अपने वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन प्रोग्राम को खत्म करने के लिए राजी हो गया. इसमें उसका न्यूक्लियर प्रयास भी शामिल था. कोल्ड वॉर के आखिर में साउथ अफ्रीका ने 6 न्यूक्लियर हथियारों को खत्म करने का ऐसा बड़ा फैसला लिया जो पहले कभी नहीं हुआ था. इन हथियारों को उसने चुपके से बनाया था. हालांकि यह फैसला अंदरूनी तौर पर लिया गया था.
दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा न्यूक्लियर हथियार
सोवियत यूनियन के टूटने के बाद तीन नए आजाद हुए देश यूक्रेन, कजाकिस्तान और बेलारूस के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा न्यूक्लियर हथियार था. यूनाइटेड स्टेट्स और रूस की अगुवाई में डिप्लोमेटिक बातचीत के जरिए यह देश बुडापेस्ट मेमोरेंडम के तहत अपने न्यूक्लियर हथियार रूस को ट्रांसफर करने और नॉन न्यूक्लियर देश के तौर पर एनपीटी में शामिल होने पर राजी हो गया.
इंटरनेशनल प्रतिबंध और हथियारों की जांच
1991 के गल्फ वॉर के बाद यूनाइटेड स्टेट्स में सद्दाम हुसैन के तहत इराक के संदिग्ध हथियार प्रोग्राम को खत्म करने के मकसद से इंटरनेशनल प्रतिबंध और हथियारों की जांच की. कई सालों तक यूनाइटेड नेशन की जांच और बैन ने इराक की न्यूक्लियर क्षमताओं को काफी कम कर दिया.
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