जरा कल्पना कीजिए, आपने एक कॉल सुनी, उसी दौरान खाना बनाया, बीच-बीच में ईमेल भेजा और लंच करते समय मोबाइल भी चेक कर लिया. आपको लग रहा होगा कि आपने कम वक्त में ढेर सारे काम निपटा लिए और खुद पर थोड़ा गर्व भी महसूस हो रहा होगा. लेकिन ज़रा रुकिए. जिस तेज़ी और मल्टीटास्किंग को आप अपनी कामयाबी समझ रहे हैं, वही असल में आपके लिए एक तरह की “स्लो सुसाइड” साबित हो सकती है. डॉक्टर तरंग कृष्णा के मुताबिक दिमाग इस तरह के लगातार ओवरलोड और भागदौड़ को लंबे समय तक सहन नहीं कर पाता. ऐसे में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि मल्टीटास्किंग की आदत दिमागी सेहत के लिए किस तरह नुकसानदायक बन सकती है.
क्या कहती है स्टैनफोर्ड की रिसर्च?
स्टैनफोर्ड की रिसर्च के अनुसार मल्टीटास्किंग आपकी काम करने की क्षमता को 40 प्रतिशत तक कम कर देती है. हमारा दिमाग इस तरह बना है कि वह एक समय में केवल एक ही चीज पर फोकस कर सके. जब हम अपने ध्यान को बांटते हैं, तो हमारी मेंटल एनर्जी लीक होने लगती है और बर्बाद हो जाती है.
सेहत पर पड़ता है खतरनाक असर
असलियत यह है कि लगातार मल्टीटास्किंग करने से दिमाग अत्यधिक थक जाता है और ओवरलोड की स्थिति में पहुंच जाता है. यह लगातार बनी रहने वाली मानसिक थकान इम्यून सिस्टम को कमजोर करने लगती है. जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता संतुलन खो देती है, तो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ने लगता है. यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे एक तरह की “स्लो सुसाइड” मानते हैं.
अपनाएं 20 मिनट का फॉर्मूला
डॉक्टरों के अनुसार इस समस्या का समाधान बेहद आसान है—एक समय में सिर्फ एक ही काम पर पूरा ध्यान दें. इसके लिए 20 मिनट का टाइमर लगाएं और उसी दौरान केवल एक लक्ष्य पर फोकस बनाए रखें.
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