ट्रंप के करीबी हंगरी के PM ओर्बन की करारी हार, 16 साल के शासन का अंत, US-UK की राजनीति में राजनीति में भी हलचल

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Washington: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सहयोगी हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन ने रविवार को विपक्षी नेता पीटर मैग्यार की मध्य-दक्षिणपंथी, यूरोपीय संघ समर्थक टिस्जा पार्टी की भारी बहुमत से हुई संसदीय जीत के बाद अपनी स्पष्ट और हार स्वीकार कर ली. ओर्बन की हार ने सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि यूरोप की राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है.

इसके बावजूद ओर्बन हार गए चुनाव 

चुनाव से ठीक पहले अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को बुडापेस्ट भेजा गया था, ताकि वे ओर्बन के समर्थन में माहौल बना सकें. लेकिन इसके बावजूद ओर्बन चुनाव हार गए, जो ट्रंप के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है. ओर्बन लंबे समय से सत्ता में थे और उन्हें वैश्विक दक्षिणपंथी नेताओं का प्रमुख चेहरा माना जाता था.  ओर्बन को ट्रंप और कई अन्य अमेरिकी नेताओं का खुला समर्थन मिला हुआ था.

सत्ताधारी नेताओं के खिलाफ बढ़ रहा असंतोष 

ट्रंप की नीतियां और ओर्बन की शासन शैली काफी हद तक एक जैसी मानी जाती हैं, खासकर प्रवासी-विरोधी रुख और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर. विशेषज्ञों का मानना है कि यह हार इस बात का संकेत है कि मौजूदा समय में दुनिया भर में सत्ताधारी नेताओं के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है. Steven Levitsky जैसे राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद विपक्ष जीत सकता है और लोकतंत्र अब भी मजबूत है.

Putin के करीबी माने जाते थे ओर्बन 

ओर्बन की हार का असर वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिल सकता है. वे रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin के करीबी माने जाते थे और उन्होंने यूक्रेन को मिलने वाली यूरोपीय सहायता में कई बार बाधा डाली थी. अब उनके हटने से यूरोप की नीतियों में बदलाव आ सकता है. अमेरिका में भी इस परिणाम पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. कुछ नेताओं ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया, तो कुछ ने विदेशी चुनावों में दखल देने पर सवाल उठाए.

सिर्फ हंगरी तक सीमित नहीं चुनाव परिणाम 

रिपब्लिकन सांसदों ने भी कहा कि दूसरे देशों के चुनावों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. कुल मिलाकर यह चुनाव परिणाम सिर्फ हंगरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, अमेरिका की रणनीति और यूरोप के भविष्य पर भी असर डाल सकता है.

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