बांग्लादेश में दिनेश त्रिवेदी होंगे भारत के नए उच्चायुक्त, BJP ने बंगाल चुनाव से पहले ममता बनर्जी को दिया बड़ा झटका

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New Delhi: भारत सरकार बांग्लादेश में अपने नए उच्चायुक्त के तौर पर वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी को नियुक्त कर सकती है. मौजूदा उच्चायुक्त प्रणय वर्मा का तबादला ब्रसेल्स किया जा सकता है और उनकी जगह त्रिवेदी को ढाका भेजने की तैयारी है. यह नियुक्ति ऐसे समय में सामने आई है जब भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों को लेकर कई अहम मुद्दों पर बातचीत जारी है और दोनों देश रिश्तों को संतुलित बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.

पश्चिम बंगाल से गहरा राजनीतिक जुड़ाव

इस नियुक्ति की घोषणा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले हो सकती है. दिनेश त्रिवेदी का पश्चिम बंगाल से गहरा राजनीतिक जुड़ाव रहा है, ऐसे में इस फैसले को कूटनीतिक के साथ-साथ राजनीतिक नजरिए से भी अहम माना जा रहा है. यह नियुक्ति सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत भी देती है. पश्चिम बंगाल की राजनीति, भारत-बांग्लादेश संबंध और केंद्र की रणनीति तीनों के बीच त्रिवेदी की भूमिका एक बार फिर अहम हो गई है.

रेल किराया बढ़ाने का निर्णय

बता दें कि 2011-12 में रेल मंत्री के तौर पर उन्होंने बड़ा फैसला लेते हुए रेल किराया बढ़ाने का निर्णय लिया था. तब इसे सुधार की दिशा में कदम माना गया. लेकिन, उसी फैसले ने उनकी कुर्सी छीन ली थी. दिनेश त्रिवेदी का जन्म 4 जून 1950 को नई दिल्ली में हुआ. वे एक शिक्षित परिवार से आते हैं. उन्होंने कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेज से इकॉनमी की पढ़ाई की और बाद में विदेश में प्रबंधन की पढ़ाई पूरी की.

कांग्रेस से शुरू हुआ राजनीतिक सफर 

राजनीति में आने से पहले उन्होंने पायलट के रूप में काम किया और अपना व्यवसाय भी संभाला. उनका राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू हुआ. बाद में वे जनता दल से जुड़े और 1990 में पहली बार राज्यसभा पहुंचे. इसके बाद वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए और पश्चिम बंगाल की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई. 2009 में वे लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे और केंद्र सरकार में स्वास्थ्य राज्य मंत्री बने.

यात्री किराया बढ़ाने का रखा प्रस्ताव 

2011 में उन्हें रेल मंत्री बनाया गया. उन्होंने रेलवे को आधुनिक और सुरक्षित बनाने के लिए कई योजनाएं तैयार कीं. 2012 के रेल बजट में उन्होंने यात्री किराया बढ़ाने का प्रस्ताव रखा. यह फैसला आर्थिक सुधार के लिहाज से जरूरी बताया गया, लेकिन राजनीतिक रूप से भारी पड़ गया. उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने इसका विरोध किया और अंततः उन्हें पद छोड़ना पड़ा. यह घटना उनके करियर का सबसे चर्चित मोड़ बनी.

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