न्यूज़ीलैंड में फिर भारतीयों के खिलाफ प्रदर्शन, विरोध में लगे नारे, लिखे गए घृणास्पद से भरे संदेश

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New Zealand: न्यूज़ीलैंड में भारतीय समुदाय को लेकर चिंताजनक घटनाएं हुई हैं. ऑकलैंड में “Kill All Indians” जैसे नारे लगे. नस्लवादी ग्रैफिटी, सिख धार्मिक जुलूसों में व्यवधान और भारत-विरोधी नारों ने भारतीय समुदाय के बीच चिंता पैदा की है. ऑकलैंड के कुछ इलाकों में भारतीयों के खिलाफ आपत्तिजनक और घृणास्पद संदेश लिखे गए. इसके अलावा कुछ सिख जुलूसों के दौरान विरोध-प्रदर्शन हुए, जिनमें प्रदर्शनकारियों ने हाका करते हुए “This is New Zealand, not India” जैसे नारे लगाए.

सोशल मीडिया पर व्यापक बहस

इन घटनाओं ने सोशल मीडिया पर व्यापक बहस छेड़ दी और भारतीय समुदाय की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे. हालांकि जमीनी स्तर पर रहने वाले कई भारतीयों का कहना है कि इन घटनाओं को पूरे देश की तस्वीर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उनके अनुसार अधिकांश शहरों और समुदायों में जीवन सामान्य और शांतिपूर्ण बना हुआ है. भारतीय मूल के लोग अब न्यूज़ीलैंड के सबसे तेजी से बढ़ते समुदायों में से एक हैं. भारतीय समुदाय देश का तीसरा सबसे बड़ा जातीय समूह बन चुका है.

वेलिंगटन में बड़ी संख्या में भारतीय

ऑकलैंड, हैमिल्टन और वेलिंगटन में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं. आईटी, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, व्यापार और परिवहन क्षेत्रों में भारतीयों की मजबूत मौजूदगी है. हाल के वर्षों में भारत से छात्रों, कुशल कर्मचारियों और परिवार आधारित प्रवासियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. यही तेज जनसंख्या वृद्धि राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय भी बनी हुई है. Destiny Church न्यूज़ीलैंड का एक विवादास्पद धार्मिक और सामाजिक संगठन है, जिसका नेतृत्व Brian Tamaki करते हैं.

मुद्दों पर आक्रामक अभियान

आलोचकों का आरोप है कि चर्च से जुड़े कुछ कार्यकर्ता आप्रवासन, सांस्कृतिक बदलाव और राष्ट्रीय पहचान जैसे मुद्दों पर आक्रामक अभियान चलाते रहे हैं. हालांकि चर्च खुद को न्यूज़ीलैंड की संस्कृति और मूल्यों की रक्षा करने वाला संगठन बताता है. यह विवाद केवल नस्लीय नहीं बल्कि कई सामाजिक और आर्थिक कारणों से भी जुड़ा है। कुछ समूहों का मानना है कि बड़ी संख्या में नए प्रवासियों के आने से स्थानीय संसाधनों पर दबाव बढ़ा है. न्यूज़ीलैंड लंबे समय से महंगे मकानों और किराए की समस्या से जूझ रहा है.

इसके लिए आप्रवासन जिम्मेदार

कुछ लोग इसके लिए आप्रवासन को जिम्मेदार ठहराते हैं, हालांकि अर्थशास्त्री इस मुद्दे को कहीं अधिक जटिल मानते हैं. कुछ राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी समूहों को लगता है कि तेजी से बदलती जनसंख्या संरचना देश की पारंपरिक पहचान को प्रभावित कर रही है.

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