New Delhi: अमेरिका ने अपनी मिलिट्री के इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम फिर से बदलकर पैसिफिक कमांड कर दिया है. अब आठ साल बाद अमेरिकी एडमिनिस्ट्रेशन ने इस बडे फैसले को पूरी तरह पलट दिया है. इस फैसले के पीछे कमांड की हिस्टोरिकल आइडेंटिटी और लिगेसी का हवाला दिया गया है. वाशिंगटन का कहना है कि इससे मिलिट्री के ऑपरेशनल काम पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
नजरिए के पांच बड़े सिग्नल
इसके बावजूद इस फैसले के गहरे जियोपॉलिटिकल मायने निकाले जा रहे हैं. यह कदम एशिया को लेकर अमेरिका के बदलते नजरिए के पांच बड़े सिग्नल दे रहा है. साल 2018 में अमेरिका ने अपनी मिलिट्री के पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर इंडो-पैसिफिक कमांड किया था. तब वाशिंगटन ने कहा था कि यह फैसला इंडियन ओशन रीजन में सहयोगियों के प्रति उनके मजबूत कमिटमेंट को दिखाता है. पेंटागन ने तब साफ किया था कि वे पैसिफिक के साथ-साथ इंडियन ओशन की स्ट्रेटेजिक इम्पोर्टेंस को अच्छी तरह समझते हैं.
चीन को घेरने के लिए नजदीकियां बढ़ाई
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले प्रेसीडेंसी कार्यकाल के दौरान चीन को एक बड़े स्ट्रेटेजिक रायवल के रूप में देखा था. उस समय उन्होंने चीन को घेरने के लिए भारत के साथ नजदीकियां बढ़ाई थीं. इसी रणनीति के तहत इंडो-पैसिफिक फ्रेमवर्क को काफी प्रमोट किया गया था. इसका मुख्य मकसद इंडियन ओशन और पैसिफिक ओशन में चीन के बढ़ते इन्फ्लुएंस को बैलेंस करना था. ट्रंप के इस कदम से दोनों महासागरों में एक मजबूत सुरक्षा व्यवस्था बनाने की कोशिश की गई थी.
बीजिंग के प्रति अमेरिकी रवैया काफी बदला
लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में बीजिंग के प्रति अमेरिकी रवैया काफी बदला हुआ नजर आ रहा है. अब अमेरिका चीन के साथ इकोनॉमिक प्रैग्मैटिज्म और लीडर लेवल डिप्लोमेसी पर ज्यादा फोकस कर रहा है. पिछले महीने ट्रंप का बीजिंग में रेड कारपेट वेलकम किया गया था. ट्रंप ने चीनी प्रेसिडेंट शी जिनपिंग से मुलाकात के दौरान उन्हें अपना अच्छा दोस्त बताया था. उन्होंने यह भी कहा था कि दोनों देशों के रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा बेहतर होने वाले हैं. दोनों देशों के बीच इकोनॉमिक कोऑपरेशन बढ़ाने के लिए कई इम्पोर्टेंट एग्रीमेंट्स भी साइन हुए हैं.
ताइवान और जापान में अनिश्चितता का माहौल
ऐसे में कमांड के नाम से ‘इंडो’ शब्द को हटाना चीन के प्रति सॉफ्ट रुख का सिग्नल हो सकता है. अमेरिका द्वारा दोबारा पैसिफिक कमांड नाम रखने से ताइवान और जापान जैसे देशों में अनिश्चितता का माहौल बन गया है. ये दोनों देश चीन के मिलिट्री प्रेशर से बचने के लिए पूरी तरह अमेरिकी सपोर्ट पर डिपेंड रहते हैं. नए फैसले को देखकर ऐसा लगता है कि अमेरिका अब ब्रॉड मल्टीलेटरल अलायंस के बजाय अपने ट्रेडिशनल अलायंस स्ट्रक्चर पर लौट रहा है. इससे ताइवान और जापान की सुरक्षा प्राथमिकताओं को झटका लग सकता है.
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