‘आतंकवादी को किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता’, संयुक्त राष्ट्र में भारत का सख्त संदेश

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United Nations: संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने जोर देकर कहा है कि आतंकवादी, आतंकवादी ही होता है. साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवाद को उचित ठहराने के लिए किसी भी शिकायत को आधार बनाए बिना इस हत्यारी विचारधारा को जड़ से मिटाने के मकसद से मिलकर काम करने का आह्वान किया है.

भारत सीमा पार आतंकवाद का दशकों से शिकार रहा

स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने कहा, ”भारत सीमा पार आतंकवाद का दशकों से शिकार रहा है. हमारे लोगों ने आतंकवाद की भारी कीमत चुकाई है. जानें गईं, परिवार बर्बाद हुए और समाज बिखर गए. इसी अनुभव ने भारत के इस रुख को आकार दिया है कि आतंकवाद को किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता.” उन्होंने कहा, ”चाहे कोई भी शिकायत, राजनीतिक उद्देश्य या रणनीतिक गुणाभाग हो, आतंकवाद के सभी रूपों और तरीकों की बिना किसी हिचकिचाहट के निंदा की जानी चाहिए.”

आतंकवाद से निपटने को लेकर दोहरे मानदंड खारिज

पर्वतनेनी ने संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति (जीसीटीएस) की नौवीं समीक्षा को स्वीकार किए जाने के अवसर पर बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आतंकवाद से निपटने को लेकर दोहरे मानदंडों को खारिज करना चाहिए. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने वालों, उनकी साजिश रचने वालों, उन्हें वित्तीय मदद देने वालों और उनके प्रायोजकों को जवाबदेह ठहराना तथा न्याय के कठघरे में लाना जरूरी है.

देशों को इस संबंध में पूरा सहयोग

उन्होंने कहा कि सदस्य देशों को इस संबंध में पूरा सहयोग करना चाहिए. पर्वतनेनी ने कहा, ”आतंकवादी, आतंकवादी ही होता है. हमें आतंकवाद को उचित ठहराने के लिए किसी भी शिकायत को आधार बनाए बिना इस हत्यारी विचारधारा को जड़ से मिटाने के उद्देश्य से मिलकर काम करना चाहिए.” भारत ने कहा कि आतंकवाद-रोधी प्रयासों को गलत तुलना या राजनीतिक रंग वाले विमर्श के कारण कमजोर नहीं किया जाना चाहिए.

पहला मानवाधिकार जीवन का अधिकार

पर्वतनेनी ने कहा, ”हमें आतंकवाद को फैलाने में मददगार परिस्थितियों से निपटना चाहिए लेकिन हमें कभी भी परिस्थितियों को आतंकवाद के औचित्य के रूप में नहीं देखना चाहिए. हमें मानवाधिकारों और कानून के शासन को कायम रखना चाहिए लेकिन यह भी स्वीकार करना चाहिए कि पहला मानवाधिकार जीवन का अधिकार है और आतंकवाद इस मानवाधिकार पर सबसे प्रत्यक्ष हमला है.”

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