Russia India ties: भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ तीनदिवसीय रूस दौरे पर थे. बीते 8 साल में पहली बार सेवारत भारतीय सेना प्रमुख ने रूस की यात्रा की. उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब सेना दो तरह के दबावों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रही है, जिसमें पहला- आर्मी को रूस से मिले पुराने सिस्टम को स्पेयर पार्ट्स और मरम्मत सप्लाई चालू रखने की जरूरत है, वहीं, दूसरा- स्वदेशी क्षमता विकसित करके और सप्लायर बेस बढ़ाकर आयातित उपकरणों पर निर्भरता कम करने का उद्देश्य.
सेना प्रमुख की इस यात्रा से भारतीय सेना के रूसी मूल के बेड़े के लिए स्पेयर पार्ट्स, अपग्रेड और नए उपकरणों पर मुख्य रूप से ध्यान है. इससे एयर डिफेंस, इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल और भविष्य के टैंक जैसे विकल्प पुरानी निर्भरता और स्वदेशी खरीद के संतुलन की कोशिश का पता चलता है.
वरिष्ठ स्तर पर सैन्य आदान-प्रदान
इस दौरे के दौरान जनरल सेठ की रूसी सेना प्रमुख कर्नल जनरल आंद्रे मोर्दविचेव और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठके हुईं. इसमें सबसे जरूरी मुद्दों में से एक सेना के पास पहले से मौजूद रूसी उपकरणों के स्पेयर पार्ट और जरूरी सामान की सप्लाई रहा. इसके अलावा, इस सूची में असॉल्ट राइफल, बख्तरबंद पर्सनल कैरियर, टैंक, एयर डिफेंस सिस्टम और रॉकेट लॉन्चर भी शामिल हैं.
रूसी प्लेटफॉर्म सेना में आर्मर्ड कोर और मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री में गहराई से जुड़े हुए हैं, भले ही सेना स्रोतों में विविधता ला रही है. यह कोई मामूली लॉजिस्टिक्स का मुद्दा नहीं है. सेना का रूसी मूल के उपकरणों पर निर्भर होने का मतलब सप्लाई चेन में किसी भी तरह की रुकावट से सेना की तैयारी पर सिर्फ किसी एक फ्लीट या रेजिमेंट के बजाय बड़े पैमाने पर असर पड़ सकता है.
एयर डिफेंस अहम प्राथमिकता
दरअसल, भारत के लिए रूसी एयर डिफेंस बेहद अहम हैं. वहीं, जिन नए सिस्टम पर चर्चा हो रही है, उनमें रूस का अपग्रेडेड शॉर्ट-रेंज मोबाइल एयर-डिफेंस प्लेटफॉर्म पैंटसिर-S1M (Pantsir-S1M) शामिल है, जिसमें सरफेस-टू-एयर मिसाइलों के साथ दो 30 mm तोपें लगी हैं. इसे एयरक्राफ्ट, क्रूज मिसाइलों, ड्रोन और सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों से मुकाबले के लिए बनाया गया है.
सेना की इस सिस्टम में दिलचस्पी कैरियर एयर डिफेंस ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म की बड़ी जरूरत से जुड़ी है। सेना को ऐसे कम से कम 90 सिस्टम चाहिए जिनमें कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा भारत में बना हो। यह जरूरत बताती है कि एयर डिफेंस अब सिर्फ फायरपावर से नहीं बल्कि तेजी से चलने की क्षमता और हमले से बचकर टिके रहने की क्षमत से तय हो रहा है।
भारत-रूस रक्षा संबंध
जनरल सेठ का यह रूसी दौरा रखरखाव, समय-सीमा और क्षमता की कमियों के बारे में है. दरअसल, सेना अभी भी कई अहम कैटेगरी में रूसी सिस्टम पर निर्भर है और यह सच्चाई मॉस्को को बढ़त देती है. यह दौरा तीन रुझानों के मिलन बिंदु पर है, जो…
- पुराने बेड़े को बनाए रखने की जरूरत.
- कम दूरी के एयर-डिफेंस समाधानों की तलाश.
- सेना के लिए अगली पीढ़ी के आर्मर्ड प्लेटफॉर्म तय करना.
इन सभी मोर्चों पर जनरल सेठ के दौरे के बाद जितनी प्रगति होगी, उससे यह तय होगा कि रूस एक मुख्य सप्लायर बना रहेगा, एक खास पार्टनर बनेगा या फिर भारत के आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने के दौरान सिर्फ अंतरिम मदद देगा.

