Donald Trump Vladimir Putin meeting: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन से साथ 4.5 सालों से चल रही जंग पर चर्चा करने के लिए ट्रंप और शी जिनपिंग के साथ बैठक की पेशकश की है. इस दौरान दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने जेलेंस्की का नाम तक नहीं लिया. वहीं भारत पहले ही मध्यस्थता में शामिल होने के लिए हामी भर चुका है.
द वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 9 अक्टूबर को ट्रंप से फोन पर बातचीत के दौरान अगले महीने बैठक का सुझाव दिया. क्रेमलिन ने संभावित मुलाकात पर चर्चा की पुष्टि की है, लेकिन इस एजेंडे पर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है. दरअसल, ट्रंप ने भी अभी औपचारिक मंजूरी नहीं दी है. हालांकि प्रस्तावित बैठक 18-19 नवंबर को चीन के शेनझेन में होने वाले एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन (APEC) शिखर सम्मेलन के दौरान होने की संभावना है. वहीं, इसी बातचीत के दौरान रूसी डीजल की अमेरिकी खरीद और उसकी बिक्री को सरल बनाने से जुड़े समझौते की खबर भी सामने आई.
युद्ध के मैदान से बातचीत की मेज तक
बता दें कि पुतिन की रणनीति का बड़ा हिस्सा यह है कि युद्ध समाप्त करने की शर्तें तय करने में रूस को निर्णायक भूमिका मिले. ट्रंप के युद्ध जल्द खत्म करने के आग्रह और चीन के साथ रूस के मजबूत रिश्तों का लाभ उठाकर मॉस्को अपने लिए अनुकूल समझौते की जमीन तलाश कर रहा है. इसमें कब्जे वाले क्षेत्रों का भविष्य, यूक्रेन की सुरक्षा व्यवस्था और पश्चिमी सैन्य गठबंधनों से उसका संबंध जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं.
कमजोर पड़ सकती है यूरोपीय देशों की भूमिका
हालांकि जेलेंस्की को बाहर रखकर किया गया कोई समझौता यूक्रेन की सहमति और संप्रभुता पर गंभीर सवाल खड़े करेगा. इससे यूरोपीय देशों की भूमिका भी कमजोर पड़ सकती है, जबकि वे यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक सहायता देते रहे हैं. दरअसल, रूसी राष्ट्रपति यूक्रेन युद्ध को केवल सैन्य ताकत के दम पर नहीं, बल्कि कूटनीतिक चालों के जरिए भी अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रस्तावित त्रिपक्षीय बैठक इसी रणनीति का संकेत है.
रूस की जीत या शांति का अवसर?
हालांकि इस दौरान पुतिन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे युद्ध को अपने अनुकूल समाप्त करना चाहते हैं लेकिन स्थायी शांति के लिए यूक्रेन की सहमति जरूरी होगी. ट्रंप और शी के साथ संभावित बैठक रूस को बड़ा कूटनीतिक मंच दे सकती है लेकिन इससे शांति अपने आप सुनिश्चित नहीं होगी. भारत के लिए अवसर यह है कि वह किसी एक शक्ति के पक्ष में खड़े होने के बजाय सभी पक्षों को बातचीत की मेज तक लाने में मदद करे. अंत में युद्ध में रूस की कूटनीतिक बढ़त तभी टिकाऊ होगी, जब समझौता केवल महाशक्तियों की सहमति नहीं बल्कि यूक्रेन की सुरक्षा और संप्रभुता को भी स्वीकार करे.

