Riyadh: दो बांग्लादेशी नागरिकों को सऊदी अरब में फांसी दिए जाने के बाद ढाका की राजनयिक भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. नजरुल इस्लाम और स्वीटी अख्तर को 14 अक्टूबर को मौत की सजा दी गई थी. सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के मुताबिक, दोनों को मक्का की एक मस्जिद में कथित अशोभनीय कृत्य करने के मामले में दोषी ठहराया गया था. इसी दौरान श्रीलंका अपने नागरिक अनोजान शिवरासा की मौत की सजा पलटवाने में कामयाब रहा. शिवरासा को इंटरनेट पर धार्मिक अपमान से जुड़ी मानी गई एक पोस्ट के मामले में सजा सुनाई गई थी. श्रीलंका ने उनके मामले में राजनयिक बातचीत और कानूनी सहायता की पहल की. 13 अक्टूबर को सऊदी अरब के सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी मौत की सजा पलट दी.
बांग्लादेश क्यों नहीं बचा पाया अपने दो नागरिकों की मौत?
सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के बयान के अनुसार, नजरुल इस्लाम और स्वीटी अख्तर को मक्का की एक मस्जिद के अंदर कथित अशोभनीय गतिविधियों के लिए दोषी ठहराया गया था. नजरुल ब्राह्मणबरिया और स्वीटी तंगैल की रहने वाली थीं. दोनों सऊदी अरब में अल-मजल कंपनी के लिए सफाईकर्मी के तौर पर काम करते थे. सऊदी अधिकारियों ने बताया कि दोनों को इस्लामी कानून के तहत न्यायाधीश के विवेक से दी जाने वाली सजा ‘ताजीर’ के तहत मृत्युदंड दिया गया. बयान के अनुसार, न्यायिक समीक्षा के बाद शाही आदेश जारी हुआ और सजा लागू कर दी गई. हालांकि, अधिकारियों ने कथित अपराधों का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया. गिरफ्तारी कब हुई, मुकदमे के दौरान बचाव का क्या अवसर मिला और दोनों को कानूनी सहायता किस तरह उपलब्ध कराई गई, इन सवालों पर भी सार्वजनिक जानकारी सीमित रही.
क्यों बांग्लादेश सरकार पर उठे सवाल?
बांग्लादेश की ओर से कहा गया कि सरकार को दोनों नागरिकों को फांसी दिए जाने की जानकारी सजा लागू होने के बाद मिली. इसके बाद सवाल उठा कि क्या हिरासत और मुकदमे के दौरान ढाका ने अपने नागरिकों के लिए पर्याप्त राजनयिक और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की कोशिश की थी. बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद की इस टिप्पणी की भी आलोचना हुई कि विदेश में रहने वाले नागरिकों को वहां के कानूनों का पालन करना चाहिए और कानून तोड़ने पर सरकार बहुत कुछ नहीं कर सकती. आलोचकों का कहना है कि विदेश में अपराध के आरोप लगने पर भी संबंधित सरकार की भूमिका केवल नागरिकों को कानून पालन की सलाह देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए. उसे मामले की जानकारी जुटाने, आरोपों और अदालती प्रक्रिया को समझने तथा उपलब्ध कानूनी सहायता सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए. हालांकि, सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि बांग्लादेश के अधिकारियों ने कोई कदम नहीं उठाया था या अतिरिक्त प्रयासों से फांसी रुक सकती थी.
अपने नागरिक के लिए श्रीलंका ने क्या किया?
श्रीलंकाई नागरिक अनोजान शिवरासा का मामला अलग था. उन्हें फेसबुक पर की गई एक पोस्ट के कारण धार्मिक अपमान का दोषी ठहराए जाने के बाद मौत की सजा सुनाई गई थी. सजा सुनाए जाने के बाद श्रीलंका के विदेश मंत्रालय ने मामले में राजनयिक स्तर पर बातचीत शुरू की. श्रीलंका ने सऊदी अरब में अपने राजदूत को शिवरासा से जेल में मुलाकात करने भेजा. इसके साथ ही अपील की प्रक्रिया में सहायता के लिए विशेष कानूनी टीम भी भेजी गई. इसके बाद 13 अक्टूबर को सऊदी अरब के सर्वोच्च न्यायालय ने शिवरासा की मौत की सजा पलट दी. यह घटनाक्रम बांग्लादेश के दोनों नागरिकों को 14 अक्टूबर को फांसी दिए जाने से ठीक एक दिन पहले का है.
विदेश में हिरासत में लिए गए नागरिकों की सहायता करना संबंधित देश के कांसुलर अधिकारियों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है. कांसुलर संबंधों पर वियना कन्वेंशन का अनुच्छेद 36 विदेशी नागरिकों को हिरासत में लिए जाने पर कांसुलर संपर्क और सूचना से जुड़े अधिकारों का प्रावधान करता है. हालांकि, इस प्रावधान के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बांग्लादेश के मामले में इसका उल्लंघन हुआ, क्योंकि इसके लिए विस्तृत तथ्य आवश्यक हैं. श्रीलंका के मामले से यह जरूर सामने आता है कि राजनयिक संपर्क, जेल में नागरिक से मुलाकात और कानूनी अपील में सहायता किसी गंभीर मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन दोनों मामलों के आरोप, कानूनी परिस्थितियां और न्यायिक प्रक्रियाएं अलग थीं.

