पुष्कर (राजस्थान): परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने अपने प्रवचन में कहा कि संसार का प्रत्येक जीव परमात्मा का ही स्वरूप है, लेकिन अज्ञान के कारण मनुष्य स्वयं को अलग मानने लगता है. उन्होंने बताया कि जब तक चेतना पर अज्ञान का आवरण बना रहता है, तब तक मनुष्य जीव भाव में रहता है.
मोरारी बापू ने कहा कि अज्ञान से मुक्त चेतना ही ईश्वर है और अज्ञान से ढकी चेतना जीव के रूप में दिखाई देती है. ज्ञानी महापुरुष इन दोनों में कोई अंतर नहीं मानते, क्योंकि मूल रूप से दोनों एक ही हैं.
धान और चावल से समझाया आध्यात्मिक ज्ञान
अपने प्रवचन में उन्होंने एक सरल उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे धान और चावल एक ही होते हैं, लेकिन धान से सीधे भात नहीं बन सकता. धान के ऊपर से छिलका हटाने के बाद ही चावल बनता है और उससे भोजन तैयार होता है.
इसी प्रकार मनुष्य की चेतना पर अज्ञान का आवरण छाया रहता है. जब यह आवरण हट जाता है, तब मनुष्य को अपने भीतर और सभी जीवों में परमात्मा के दर्शन होने लगते हैं.
धन का सदुपयोग ही लक्ष्मी की प्रसन्नता का कारण
मोरारी बापू ने धन के उपयोग पर भी महत्वपूर्ण संदेश दिया. उन्होंने कहा कि यदि लक्ष्मी को माता मानकर धन का उपयोग सत्कर्मों और सेवा कार्यों में किया जाए, तो वह प्रसन्न होती हैं. लेकिन यदि धन का उपयोग गलत उद्देश्यों के लिए किया जाए, तो वही संपत्ति व्यक्ति के लिए कष्ट का कारण बन सकती है.
भक्ति के बिना जीवन अधूरा
उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टि से भक्ति के बिना जीवन अधूरा है. भक्ति ही वह मार्ग है जो मनुष्य को आत्मिक शांति और मोक्ष की ओर ले जाता है. उनके अनुसार भक्ति से ही जीवन और मृत्यु दोनों सुधरते हैं.
प्रवचन के अंत में मोरारी बापू ने पुष्कर आश्रम और गोवर्धनधाम आश्रम की ओर से सभी हरि भक्तों के सुख, शांति और मंगल की कामना की.