Ganga Dussehra 2026: सनातन धर्म में गंगा दशहरा का खास महत्व है. हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है. माना जाता है कि इसी दिन मां गंगा स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं. गंगा दशहरा के दिन मां गंगा की विधि विधान से पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं. मां गंगा को लेकर एक पौराणिक कथा है, जिसके अनुसार, उन्होंने अपने 7 पुत्रों को नदी में डुबा दिया था. आइए जानते हैं आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया…
मां गंगा ने क्यों डुबा दिए थे अपने 7 पुत्र Ganga Dussehra 2026
पौराणिक कथा के अनुसार, मां गंगा का विवाह राजा शांतनु से हुआ था. गंगा माता के पास स्वयं राजा शांतनु विवाह का प्रस्ताव लेकर गए थे. गंगा मां ने उनके प्रस्ताव को मान तो लिया, हालांकि, उन्होंने उनके सामने एक शर्त रख दी. उन्होंने राजा शांतनु से कहा कि मैं आपसे शादी इस शर्त पर करुंगी कि आप कभी भी मुझसे कोई सवाल नहीं करेंगे, कभी भी किसी चीज को लेकर रोक-टोक नहीं करेंगे. राजा शांतनु ने गंगा जी की ये बात मान ली. इसके बाद उनका विवाह हो गया.
शांतनु और गंगा जी के पहले पुत्र का जन्म हुआ
शादी के बाद जब शांतनु और गंगा जी के पहले पुत्र का जन्म हुआ तो राजा के चेहरे पर खुशी छा गई. हालांकि गंगा माता ने उस पुत्र को गंगा नदी में बहा दिया. राजा शांतनु इसका कारण जानना चाहते थे, लेकिन वचनबद्ध होने के वजह से वो गंगाजी से कोई सवाल नहीं कर पाए. इसके बाद माता गंगा ने एक के बाद एक सात पुत्रों को इसी तरह गंगा नदी में बहा दिया. जब गंगा जी अपने आठवें पुत्र को गंगा नदी में डुबाने जा रही थीं तो शांतनु से रहा नहीं गया और वे इसका कारण गंगा माता से पूछ लिया.
पुत्रों को ऋषि वशिष्ठ का श्राप था
तब माता गंगा ने राजा को बताया कि मेरे पुत्रों को ऋषि वशिष्ठ का श्राप था. ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेने का और दुख भोगने का श्राप दिया था, जबकि वो वसु थे. इसीलिए मैंने इन्हें गंगा नदी में डुबा दिया ताकि ये मनुष्य योनि से मुक्ति हो जाएं. इतना कहकर अपने आठवें पुत्र को राजा शांतनु के हाथों में सौंपकर गंगा मां अंतर्धान हो गईं.
आठवें पुत्र थे देवव्रत
राजा शांतनु और माता गंगा के आठवें पुत्र थे देवव्रत, जिनका नाम बाद में भीष्म पड़ा. ऋषि वशिष्ठ के श्राप के वजह से ही भीष्म पितामह को धरती पर जन्म लेना पड़ा था और जीवनभर दुखों का सामना करना पड़ा था. उनको कोई भी सांसारिक सुख आजीवन प्राप्त नहीं हो पाया था. पूर्व जन्म में वसु होने के कारण ही भीष्म पितामह मनुष्य योनि में होने के बाद भी अत्यंत पराक्रमी और ओजस्वी थे.

