पुष्कर/राजस्थान: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि केवल ज्ञान की चर्चा करने से जीवन में शांति प्राप्त नहीं होती, बल्कि जब व्यक्ति उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारता है तभी सच्ची संतुष्टि और शांति मिलती है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह भोजन की बात करने से भूख नहीं मिटती, उसी तरह केवल ज्ञान की बातें करने से आत्मिक शांति नहीं मिलती.
संत मोरारी बापू ने कहा कि तृप्ति तभी मिलती है जब व्यक्ति भोजन करता है और उसी प्रकार आध्यात्मिक शांति तब मिलती है जब ज्ञान को व्यवहार और आचरण में उतारा जाए. उन्होंने कहा कि ज्ञान को जीवन में पचाने का अर्थ है हर जीव में ईश्वर के दर्शन करना और सभी के प्रति स्नेह और सेवा भाव रखना.
हर जीव में ईश्वर का दर्शन जरूरी
संत मोरारी बापू ने अपने प्रवचन में कहा कि ईश्वर केवल शब्दों या भाषण का विषय नहीं है. ईश्वर का वास्तविक अनुभव तब होता है जब मनुष्य अपने जीवन में उसे महसूस करता है और हर जीव में उसकी उपस्थिति को स्वीकार करता है.
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य यह अनुभव कर लेता है कि पूरे जगत में ईश्वर का ही वास है, तब उसके भीतर स्वाभाविक रूप से प्रेम, करुणा और सेवा की भावना विकसित हो जाती है.
सच्चा ज्ञान वही जो जीवन में उतरे
उन्होंने आगे कहा कि सच्चा ज्ञान वही है जो व्यवहार में दिखाई दे. यदि कोई व्यक्ति सत्य को जानने के बाद उसे अपने आचरण में उतार लेता है, तभी वह ज्ञान सार्थक होता है.
संत मोरारी बापू ने यह भी कहा कि जिस धन को मेहनत और ईमानदारी से कमाया जाता है, वही जीवन में सद्बुद्धि और संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है.
जीवन को सफल बनाने का संदेश
प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि जिसका जीवन ईश्वर की स्मृति से जुड़ा रहता है, उसका जीवन स्वतः सफल और सार्थक बन जाता है. उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को ईश्वर भक्ति, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी.
अंत में संत मोरारी बापू ने पुष्कर आश्रम और गोवर्धनधाम आश्रम की ओर से सभी श्रद्धालुओं और हरि भक्तों को शुभ मंगलकामनाएं दीं और सभी को प्रेम, सेवा और भक्ति का संदेश दिया.