भारत-EU FTA से खुलेंगे कारोबार के नए दरवाजे, फिनलैंड के ट्रेड काउंसलर बोले- यूरोपीय कंपनियां उत्साहित

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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India-EU FTA: भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) दोनों पक्षों के कारोबार के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है. फिनलैंड दूतावास के ट्रेड काउंसलर एंटी हेरलेवी ने शुक्रवार को कहा कि इस समझौते से भारत और यूरोपीय देशों के बीच व्यावसायिक सहयोग को नई ऊंचाई मिल सकती है. उन्होंने कहा कि यूरोपीय कंपनियां भारतीय उद्योगों के साथ ज्यादा करीब से काम करने को लेकर उत्साहित हैं और समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन का इंतजार कर रही हैं.

FTA को लेकर यूरोपीय कंपनियों में उत्साह

हेरलेवी ने कहा, “यह वर्ष बेहद महत्वपूर्ण है. जैसा कि आप जानते हैं, मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर हो चुके हैं और यूरोपीय कंपनियां भारत तथा भारतीय उद्योगों के साथ अधिक गहराई से काम करने की इच्छुक हैं. इस समझौते को लेकर काफी उत्साह है और हमें उम्मीद है कि इसकी सभी व्यावहारिक प्रक्रियाएं जल्द पूरी हो जाएंगी.” उन्होंने कहा कि कारोबारी जगत इस समझौते के लागू होने का इंतजार कर रहा है, क्योंकि इससे दोनों पक्षों की कंपनियों को व्यापार बढ़ाने, निवेश करने और नई व्यावसायिक साझेदारियां बनाने के अवसर मिल सकते हैं. उनके मुताबिक, यह समझौता वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत और यूरोप के बीच सहयोग को भी मजबूत कर सकता है.

चक्रीय अर्थव्यवस्था में भारत-फिनलैंड सहयोग की संभावना

हेरलेवी ने चक्रीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी भारत और फिनलैंड के बीच सहयोग की संभावनाओं पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि भारत इस क्षेत्र में फिनलैंड के अनुभव से महत्वपूर्ण लाभ उठा सकता है. उनके अनुसार, फिनलैंड समेत कई यूरोपीय देशों ने लंबे समय से चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को अपनाने और रैखिक व्यवस्था की जगह ज्यादा टिकाऊ मॉडल विकसित करने पर काम किया है. दोनों देशों की कंपनियां संसाधनों की खपत कम करने, उत्पाद डिजाइन को बेहतर बनाने और रीसाइक्लिंग सिस्टम को मजबूत करने के लिए साथ काम कर सकती हैं.

कम संसाधनों के इस्तेमाल पर जोर

हेरलेवी ने कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था का मकसद संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना और कचरे को कम करना है. अगर सामग्री की खपत कम की जाती है, तो इसका असर पूरी सप्लाई चेन पर पड़ सकता है. कम सामग्री के इस्तेमाल से ऊर्जा और पानी की खपत घट सकती है. साथ ही नई कच्ची सामग्री पर निर्भरता भी कम हो सकती है, जिनके उत्पादन में आमतौर पर ज्यादा ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन होता है.

हेरलेवी ने कहा, “सरल शब्दों में कहें तो हमें कम सामग्री का उपयोग करना चाहिए और अधिक से अधिक पुनर्चक्रण करना चाहिए. यह वास्तव में एक बड़ा बदलाव लाने वाला कदम हो सकता है.”

उत्पाद डिजाइन से शुरू होनी चाहिए चक्रीय अर्थव्यवस्था

ट्रेड काउंसलर ने कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में बदलाव उत्पाद के इस्तेमाल के बाद नहीं, बल्कि उसके डिजाइन चरण से ही शुरू होना चाहिए. उनके मुताबिक, कंपनियों को ऐसे उत्पाद तैयार करने चाहिए जिनमें कम सामग्री का इस्तेमाल हो, जिनका जीवनकाल लंबा हो और जिनमें इस्तेमाल की गई सामग्री को बाद में आसानी से रीसाइकिल किया जा सके. उन्होंने कहा, “यह प्रक्रिया शुरुआती चरण से शुरू होती है. बेहतर योजना और उत्पाद डिजाइन ही ऐसे टिकाऊ उत्पादों का आधार बन सकती हैं जो चक्रीय अर्थव्यवस्था के अनुरूप हों.”

इस तरह भारत-ईयू एफटीए से व्यापार और निवेश के नए अवसरों के साथ भारत और यूरोप के बीच टिकाऊ उत्पादन, संसाधन संरक्षण और चक्रीय अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं भी मजबूत हो सकती हैं.

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