India Pharma Innovation: भारत का फार्मास्युटिकल सेक्टर तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है. जो देश लंबे समय तक दुनिया की “फार्मेसी” के रूप में जेनेरिक दवाओं के उत्पादन के लिए जाना जाता था, अब वह नई और इनोवेटिव दवाओं के रिसर्च एवं डेवलपमेंट में भी अपनी मजबूत पहचान बना रहा है. एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में भारत में विकसित फार्मास्युटिकल पेटेंट की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है. साथ ही दवा खोज से जुड़े प्रोजेक्ट्स, बायोटेक स्टार्टअप्स और निवेश में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है.
10 साल में चार गुना से ज्यादा बढ़े फार्मा पेटेंट
बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) और हेल्थकोइस की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में विकसित फार्मास्युटिकल पेटेंट फैमिली की संख्या वर्ष 2015 में करीब 716 थी, जो 2024 तक बढ़कर 2,995 पहुंच गई. यानी एक दशक में इसमें चार गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल जेनेरिक दवाओं के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि रिसर्च और इनोवेशन आधारित मॉडल की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है.
दवा खोज की पाइपलाइन भी हुई मजबूत
रिपोर्ट के अनुसार, देश में 195 कंपनियों के पास अब 1,095 से अधिक ड्रग डिस्कवरी प्रोजेक्ट्स मौजूद हैं. यह आंकड़ा बताता है कि भारतीय कंपनियां नई दवाओं के विकास पर पहले की तुलना में कहीं अधिक निवेश और रिसर्च कर रही हैं.
निवेश और बायोटेक स्टार्टअप्स में भी तेजी
फार्मास्युटिकल सेक्टर में निवेश भी तेजी से बढ़ा है. वित्त वर्ष 2026 में इस क्षेत्र में प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल निवेश बढ़कर 731 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो पहले की तुलना में दोगुने से अधिक है. वहीं, देश में बायोटेक स्टार्टअप्स की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या लगभग 1,500 से बढ़कर 2,400 तक पहुंच गई है.
वैश्विक पेटेंट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ी
रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक फार्मा पेटेंट में भारत की हिस्सेदारी पहले 3-4% के आसपास थी, जो अब बढ़कर करीब 10% हो गई है. यह केवल पेटेंट की संख्या में वृद्धि नहीं, बल्कि भारतीय रिसर्च की गुणवत्ता में भी सुधार का संकेत माना जा रहा है.
इनोवेटिव दवाओं पर बढ़ा फोकस
पिछले एक दशक में भारत ने 10 से अधिक नई दवा परिसंपत्तियां विकसित की हैं. भारतीय कंपनियां अब केवल जेनेरिक और बायोसिमिलर दवाओं के उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नई दवाओं के विकास, लाइसेंसिंग और वैश्विक बाजार में उनके व्यावसायीकरण की दिशा में भी तेजी से काम कर रही हैं.
इन वजहों से मिली रफ्तार
रिपोर्ट में इस बदलाव के पीछे कई अहम कारण बताए गए हैं. इनमें शुरुआती और ट्रांसलेशनल रिसर्च के लिए सरकार की ओर से करीब 5 अरब डॉलर की फंडिंग, शिक्षा संस्थानों और उद्योग के बीच बेहतर सहयोग, नियामकीय सुधारों के चलते दवा विकास की समयसीमा में कमी और जीनोम वैली तथा सी-कैंप जैसी साझा अनुसंधान एवं विनिर्माण सुविधाओं का विस्तार शामिल है.
स्वदेशी तकनीकों ने भी बनाई पहचान
रिपोर्ट में भारत की कुछ अहम उपलब्धियों का भी जिक्र किया गया है. इनमें BIRSA 101, जिसे भारत की पहली स्वदेशी CRISPR आधारित थेरेपी माना जाता है, और NEXCAR19, एक स्वदेशी CAR-T थेरेपी शामिल हैं. खास बात यह है कि NEXCAR19 की लागत विदेशों में उपलब्ध समान उपचारों की तुलना में करीब दसवें हिस्से के बराबर बताई गई है.
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