म‍िड‍िल ईस्‍ट में युद्ध के बीच भारत ने एलपीजी संकट का किया समाधान, अब देश में नहीं होगी स‍िलेंडर की कमी

New Delhi: मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने देश में सबसे बड़ी चुनौती बनी LPG संकट को मिनटों में निपटा दिया है. भारत को एलपीजी की दिक्कत नहीं होने वाली है. बीते 6 महीने के आंकड़े देखें तो भारत ने सबसे ज्यादा एलपीजी आयात अमेरिका से किया है और उसकी हिस्सेदारी बढ़कर 50 फीसदी पहुंच गई है, जो पहले 10 फीसदी से भी कम थी. भारत के एलपीजी आयात के पिछले 12 महीनों के आंकड़े देखें तो तस्वीर बिलकुल साफ हो जाती है कि किस तरह संकट बढ़ते ही सरकार ने पूरी रणनीति को शिफ्ट कर दिया है.

भारत ज्यादातर एलपीजी खाड़ी देशों से मंगाता था

पिछले साल सितंबर से इस साल फरवरी तक के आंकड़े बताते हैं कि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर एलपीजी खाड़ी देशों जैसे यूएई, कतर, सऊदी अरब और कुवैत से मंगाता था, लेकिन मार्च में ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच युद्ध शुरू होने के बाद सारा माजरा बदल गया. युद्ध और तनाव की वजह से खाड़ी देशों से भारत का एलपीजी आयात 40 फीसदी कम हो गया. संकट के इस माहौल में सरकार ने अपना ज्यादातर आयात अमेरिका से करना शुरू कर दिया है.

अमेरिका से एलपीजी आयात 7.9 फीसदी

सितंबर 2025 से फरवरी 2026 तक अमेरिका से एलपीजी आयात 7.9 फीसदी था जो मार्च से अगस्त तक बढ़कर 53 फीसदी हो गया है. मार्च से पहले भारत का करीब 38 फीसदी एलपीजी आयात यूएई से होता था, जो बीते 6 महीने में गिरकर 13.4 फीसदी हो गया है. सऊदी अरब भी मार्च से पहले तक भारत को 14.1 फीसदी एलपीजी का निर्यात करता था, जो अब महज 5.9 फीसदी रह गया है.

21 फीसदी से ज्यादा एलपीजी का निर्यात

कतर भी मार्च 2026 से पहले भारत को 21 फीसदी से ज्यादा एलपीजी का निर्यात करता था, लेकिन अब यह गिरकर 5.7 फीसदी पहुंच गया है. कुवैत से एलपीजी आयात की हिस्सेदारी मार्च के बाद सिर्फ 4.9 फीसदी रहा गया है, जो मार्च से पहले 15.1 फीसदी रहा था. ईरान-अमेरिका युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज जलडमरूमध्य भारत के लिए एनर्जी सप्लाई का लाइफलाइन था. हमारी जरूरत का 40 फीसदी कच्चा तेल, 60 फीसदी एलएनजी और 90 फीसदी एलपीजी का आयात इसी रास्ते से होता था.

88 फीसदी कच्चा तेल आयात

भारत अपनी जरूरत का 88 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, जबकि 60 फीसदी एलपीजी और 50 फीसदी एलएनजी के लिए भी आयात पर ही निर्भर है. कुल मिलाकर देखें तो यह रास्ता भारत की 54 फीसदी एनर्जी जरूरतों को पूरा करता था, लेकिन युद्ध के बाद स्थितियां बदल गईं और भारत ने इसका विकल्प तलाश लिया.

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