New Delhi: वैश्विक बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेजी के कारण भारत की सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को भारी घाटा हो रहा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कंपनियों को डीजल पर करीब ₹100 प्रति लीटर और पेट्रोल पर लगभग ₹20 प्रति लीटर का नुकसान (अंडर-रिकवरी) हो रहा है. इसके बावजूद कंपनियों ने आम उपभोक्ताओं को राहत देते हुए ईंधन की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की है.
कीमतों में वृद्धि की योजना से इनकार
भारी घाटे के बावजूद सरकार ने अभी तुरंत पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि करने की किसी भी योजना से इनकार किया है. यह स्थिति मुख्य रूप से पश्चिमी एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति में अस्थिरता के चलते बनी है. पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, कच्चे तेल की औसत कीमत पिछले साल के 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर इस महीने 113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है. इस बढ़ोतरी का सीधा असर तेल कंपनियों के मुनाफे पर पड़ा है.
कीमतों में ₹25-₹28 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी
फिलहाल सरकार और तेल कंपनियां मिलकर इस अतिरिक्त बोझ को खुद वहन कर रही हैं. हाल ही में यह खबर सामने आई थी कि चुनावों के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में ₹25-₹28 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो सकती है. हालांकि सरकार ने इन खबरों को खारिज करते हुए कहा है कि ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है और ये अफवाहें भ्रामक हैं. महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकार ने हाल ही में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में ₹10 प्रति लीटर की कटौती की है.
कच्चे तेल उत्पादकों पर विंडफॉल टैक्स भी लागू
इसके अलावा डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल के निर्यात पर अतिरिक्त शुल्क लगाया गया है, ताकि घरेलू आपूर्ति बनी रहे. कच्चे तेल उत्पादकों पर विंडफॉल टैक्स भी लागू किया गया है. भारत अपनी करीब 88% कच्चे तेल की जरूरत आयात करता है. ऐसे में कीमतों में उछाल सीधे देश के आयात बिल और महंगाई पर असर डालता है. ब्रेंट क्रूड के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से भारत का आयात खर्च रोजाना 190 से 210 मिलियन डॉलर तक बढ़ सकता है.
इसे भी पढ़ें. रिलीज से दो दिन पहले ही विवादों में आई वेब सीरीज ‘Lawrence of Punjab’, केंद्र सरकार ने लगाई रोक

