Islamabad: पाकिस्तान सरकार ने हाल ही में देश की मेडिकल यूनिवर्सिटीज को आदेश दिया है कि अफगानिस्तान के नागरिक छात्रों को तुरंत मेडिकल और डेंटल कार्यक्रमों से निकाल दिया जाए. इस आदेश के बाद वो छात्र परेशान हैं, जो डॉक्टर बस बनने ही वाले थे और उन्हें डिपोर्ट किया जा रहा है. पाकिस्तान मेडिकल एंड डेंटल काउंसिल (पीएमडीसी) के निर्देशों के तहत कई संस्थानों ने छात्रों को सिर्फ 24 घंटे का समय दिया है कि वे देश छोड़ दें.
शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा की अपील
तालिबान दूतावास ने भी इसे जबरन निर्वासन कहा है और शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा की अपील की है. पूर्व विशेष प्रतिनिधि आसिफ दुर्रानी ने इस कदम को चौंकाने वाला बताया. उन्होंने कहा कि खासकर युवा महिलाओं के लिए यह मानवीय और नैतिक मुद्दा है. शिक्षा उनके लिए विशेषाधिकार नहीं बल्कि भविष्य तय करने वाला मौका है. उन्होंने पाकिस्तान से फैसला वापस लेने की अपील की.
एक हजार अफगान छात्र फैसले से प्रभावित
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फातिमा जिन्नाह मेडिकल यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज लाहौर जैसे संस्थानों के पत्रों में इसे राष्ट्रीय नीति से जोड़ते हुए हाई प्रॉयोरिटी बताई गई है. लगभग एक हजार अफगान छात्र इस फैसले से प्रभावित हुए हैं, जिनमें से कई स्कॉलरशिप पर पढ़ाई कर रहे हैं. ये छात्र अलामा मुहम्मद इकबाल स्कॉलरशिप के जरिए पाकिस्तान आए थे.
तालिबान या उसकी नीतियों से कोई संबंध नहीं
कई छात्र इसमें से अंतिम वर्ष में हैं और सिर्फ कुछ महीने बाद ग्रेजुएट होने वाले थे. उनके लिए हालात और भी ज्यादा सदमा देने वाले हैं. छात्र कहते हैं कि उनका तालिबान या उसकी नीतियों से कोई संबंध नहीं है. वे पाकिस्तान में पढ़ाई करके अपना भविष्य बनाना चाहते थे. खासतौर पर महिलाओं के लिए ये बड़ा मौका था क्योंकि तालिबान शासन में उन्हें पढ़ाई का मौका नहीं मिलता. अब उन्हें वापस भेजने से वर्षों की मेहनत, पैसे और भविष्य के अवसर एक साथ खत्म हो जाएंगे.
किताबें और सामान समेटने तक की छूट नहीं
इस फैसले ने छात्रों की जिंदगी अस्त-व्यस्त कर दी है. हॉस्टल छोड़ने का इतना कम समय मिला है कि किताबें और सामान समेटने तक की छूट नहीं मिल पा रही. इसके साथ ही भविष्य की अनिश्चितता और सुरक्षा की उन्हें चिंता है. वे पाकिस्तान सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि सियासी मतभेदों का शिकार निर्दोष छात्रों को न बनाया जाए. कुछ पाकिस्तानी भी इसे अमानवीय कह रहे हैं.
संबंधों में तनाव के बीच यह फैसला
पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों में तनाव के बीच यह फैसला शिक्षा को राजनीति का शिकार बनाता दिखता है. छात्रों का कहना है कि उन्हें सुनवाई का मौका मिले और अंतिम वर्ष के छात्रों को कम से कम डिग्री पूरी करने दी जाए. हालांकि पाकिस्तान डिपोर्टेशन की जिद पर अड़ा हुआ है.
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