न्यूयॉर्क: अमेरिका भारत को लौटाएगा तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियां, एक मूर्ति है बेहद खास

Ved Prakash Sharma
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

न्यूयॉर्क: अमेरिका भारत को तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियां लौटाएगा. स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन के नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने घोषणा की है कि वह भारत सरकार को तीन दुर्लभ प्राचीन कांस्य मूर्तियां वापस करेगा. गहन जांच और विस्तृत प्रोवेनेंस रिसर्च के बाद यह साबित हुआ कि इन मूर्तियों को तमिलनाडु के मंदिरों से चुराया गया था. यह कदम सांस्कृतिक धरोहर की वापसी पर बढ़ते वैश्विक प्रयासों का हिस्सा है.

ये तीन मूर्तियां दक्षिण भारतीय कांस्य कला की उत्कृष्ट कृतियां हैं, जो पारंपरिक रूप से मंदिरों में पूजा और शोभायात्राओं के लिए इस्तेमाल होती थीं. इनमें शामिल है…

अमेरिका लौटाएगा ये मूर्तियां

  • शिव नटराज (चोल काल, लगभग 990 ईस्वी), यह मूर्ति शिव के नृत्य रूप को दर्शाती है, जो ब्रह्मांड के नृत्य का प्रतीक है. यह श्री भावा औषधेश्वर मंदिर, तिरुत्तुरैप्पुंडी तालुक, तंजावुर जिला, तमिलनाडु से जुड़ी हुई है, जहां इसे 1957 में फोटोग्राफ किया गया था.
  • सोमस्कंद (चोल काल, 12वीं शताब्दी), यह मूर्ति शिव-पार्वती और कार्तिकेय को एक साथ दिखाती है. यह विश्नाथ मंदिर, अलत्तूर गांव, मन्नारकुडी तालुक, तमिलनाडु से 1959 में फोटोग्राफ की गई थी.
  • संत सुंदरार विद परवई (विजयनगर काल, 16वीं शताब्दी), यह नयनार संत सुंदरार और उनकी पत्नी परवई की मूर्ति है. इसे 1956 में वीरासोलापुरम गांव के शिव मंदिर, कल्लाकुरिची तालुक, तमिलनाडु में दर्ज किया गया था.
चोरी के बाद मूर्तियों को अवैध तरीके से भेजा गया विदेश     

म्यूजियम के बयान के मुताबिक, इन मूर्तियों की उत्पत्ति की जांच में फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पॉन्डिचेरी के फोटो आर्काइव्स, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और दुनिया भर के कई संगठनों व व्यक्तियों का सहयोग मिला. जांच से पता चला है कि 1950 के दशक में इन मूर्तियों को मंदिरों से चुराया गया और अवैध तरीके से विदेश भेजा गया था. कुछ मामलों में फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ, जैसे कि शिव नटराज को 2002 में न्यूयॉर्क की डोरिस वीनर गैलरी से खरीदा गया था.

भारत सरकार ने सहमति दी है कि शिव नटराज मूर्ति को दीर्घकालिक ऋण (लॉन्ग-टर्म लोन) पर म्यूजियम में रखा जाए. इस व्यवस्था से म्यूजियम को मूर्ति की पूरी कहानी, उत्पत्ति, चोरी और वापसी को सार्वजनिक रूप से साझा करने की अनुमति मिलेगी. यह मूर्ति अब ‘दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और हिमालय क्षेत्र में ज्ञान की कला’ नाम की प्रदर्शनी में प्रदर्शित रहेगी. बाकी दो मूर्तियां, सोमस्कंद और संत सुंदरार विद परवई भारतीय दूतावास के माध्यम से भारत भेजी जाएंगी. म्यूजियम और भारतीय दूतावास इस समझौते को अंतिम रूप देने के लिए निकट संपर्क में हैं.

यह एक सकारात्मक कदम

यह घटना स्मिथसोनियन के दक्षिण एवं दक्षिणपूर्व एशियाई कला संग्रह के सिस्टेमैटिक रिव्यू का हिस्सा है, जिसमें सांस्कृतिक संपदा की नैतिक जिम्मेदारी पर जोर दिया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी वापसियां भारत की सांस्कृतिक विरासत को बहाल करने में महत्वपूर्ण हैं और वैश्विक स्तर पर लूटे गए अवशेषों की वापसी की दिशा में एक सकारात्मक कदम है.

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