Smoking Financial Loss Calculation : अक्सर देखा जाता है कि लोग बचत न कर पाने की वजह पैसों की कमी को बताते हैं, लेकिन कई बार असली कारण हमारी अपनी आदतें होती हैं. जिन पर लापरवाही के कारण हम ध्यान नहीं देते. कुछ छोटी-छोटी खर्च करने वाली आदतें धीरे-धीरे बड़ा आर्थिक नुकसान कर देती हैं और हमें इसका एहसास भी नहीं होता. ऐसी ही एक आदत है सिगरेट पीना, जिसे लोग आम खर्च मानकर नजरअंदाज करते रहते हैं.
बता दें कि सिगरेट सिर्फ सेहत पर ही नहीं, बल्कि आपकी जेब पर भी लगातार असर डालती है. हर दिन का छोटा-सा खर्च महीने और साल में बड़ी रकम में बदल जाता है, जो कि आपकी बचत और निवेश दोनों को नुकसान पहुंचाता है. रिपोर्ट के अनुसार, आपके लिए यह जानना जरूरी है कि सिगरेट का धुआं सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि आपकी आर्थिक स्थिति को भी धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाता है.
सिगरेट की कीमतों में तेज उछाल
जानकारी के मुताबिक, बीते दो दशकों में सिगरेट की कीमतों में लगातार तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है. यही कारण है कि सिगरेट पीने वालों पर लगातार आर्थिक बोझ भी बढ़ा है. बताया जा रहा है कि साल 2005 में जो पैकेट करीब 59 रुपये में मिलती थी, उसकी कीमत 2010 तक 96 रुपये और 2015 में 200 रुपये तक पहुंच गई.
इसके बाद 2020 में यह करीब 300 रुपये और 2026 में बढ़कर लगभग 480 रुपये हो गई है. कुल मिलाकर 21 साल में इसकी कीमतों में करीब 713 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. यानी पहले के मुताबिक आज सिगरेट का खर्च कई गुना बढ़ चुका है.
बड़ी चूक बन जाती है यह आदत
यदि आंकड़ों की बात करें तो एक सिगरेट पीने वाला व्यक्ति औसतन हर दिन 10 सिगरेट पी जाता है तो सिगरेट पर खर्च की जाने वाली रकम सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि एक बड़ा मौका गंवाने जैसा है. ऐसे में मान लें कि हर साल सिगरेट पर खर्च होने वाले करीब 87,600 रुपये को बचाकर एसआईपी में निवेश किया जाता है. वहीं लंबी अवधि में 12 प्रतिशत की संभावित रिटर्न के आधार पर 35 से 40 लाख रुपये की कॉर्पस खड़ा किया जा सकता है. मतलब एक आदत को छोड़कर कोई व्यक्ति अपनी वित्तीय हालात में जबरदस्त सुधार करने की ताकत रखता है.
आर्थिक के साथ-साथ सेहत को भी नुकसान
बता दें कि सिगरेट का असर सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सेहत को भी काफी नुकसान पहुंचाता है. नियमित रूप से सिगरेट पीने से कैंसर, दमा और सांस से जुड़ी कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.
इसके साथ ही अगर डॉक्टर पर हर महीने औसतन 500 रुपये भी खर्च मानें, तो सालाना 6,000 रुपये और 40 साल में करीब 2.4 लाख रुपये सिर्फ इलाज पर खर्च हो सकते हैं. साथ ही दवाईयों का खर्च अलग होगा. लेकिन अगर बीमारी बढ़ी हुई तो लाखों रुपये कुछ ही महीने में स्वाहा हो सकते है.
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