माता-पिता को डायबिटीज होने पर अगली पीढ़ी को है कितना खतरा, जानिए क्या है बचने का तरीका

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Genetic Dabetes: यदि आपके माता-पिता, भाई-बहन या परिवार के किसी करीबी सदस्य को टाइप-2 डायबिटीज है, तो इसे केवल एक पारिवारिक बीमारी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. फैमिली हिस्ट्री डायबिटीज के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में से एक है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि परिवार में डायबिटीज होने पर आपको भी यह बीमारी जरूर होगी.

बता दें कि टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कई चीजों के मिलेजुले प्रभाव से बढ़ता है. इसमें आनुवंशिक प्रवृत्ति के साथ वजन बढ़ना, पेट के आसपास ज्यादा चर्बी, शारीरिक गतिविधि की कमी, उम्र, खान-पान और कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. लेकिन अच्छी बात यह है कि इनमें से कई जोखिम कारकों पर जीवनशैली में बदलाव करके काम किया जा सकता है. इसलिए यदि आपके परिवार में किसी को डायबिटीज है, तो डरने के बजाय समय पर जांच और रोजमर्रा की आदतों पर ध्यान देना ज्यादा समझदारी है.

क्या परिवार में डायबिटीज होने से आपको भी खतरा बढ़ता है?

खासतौर पर माता-पिता या भाई-बहन जैसे करीबी रिश्तेदार को टाइप-2 डायबिटीज होने पर व्यक्ति को अन्य लोगों की तुलना में अधिक सतर्क रहने की जरूरत होती है. अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डायबिटीज एंड डाइजेस्टिव एंड किडनी डिजीजेज (NIDDK) भी फैमिली हिस्ट्री को टाइप-2 डायबिटीज के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल करता है.
हालांकि, दादा-दादी को डायबिटीज होना भी पारिवारिक जोखिम का संकेत हो सकता है. परिवार में कितने लोगों को डायबिटीज है, किस उम्र में बीमारी हुई, साथ में मोटापा या हाई ब्लड प्रेशर जैसे जोखिम हैं या नहीं, इन सभी बातों को ध्यान में रखना जरूरी है.

जेनेटिक्स और लाइफस्टाइल पर भी ध्यान देना जरूरी

अमेरिकन डायबिटिक एसोसिएशन (ADA) की 2026 गाइडलाइन में भी डायबिटीज वाले फर्स्ट-डिग्री रिश्तेदार, यानी माता-पिता, भाई या बहन, को स्क्रीनिंग के लिए महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल किया गया है. हालांकि डायबिटीज का खतरा सिर्फ जीन से तय नहीं होता. इसे समझने के लिए जेनेटिक्स और लाइफस्टाइल दोनों को साथ देखना जरूरी है.

दरअसल, कुछ लोगों में ऐसे आनुवंशिक बदलाव हो सकते हैं जो शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता और ब्लड शुगर को नियंत्रित करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं, लेकिन जीन होने का मतलब यह नहीं है कि बीमारी निश्चित रूप से विकसित होगी. दूसरी तरफ, परिवारों में केवल जीन ही साझा नहीं होते, बल्कि खाने-पीने की आदतें, शारीरिक गतिविधि का स्तर और जीवनशैली भी अक्सर समान होती है. यही कारण है कि परिवार में डायबिटीज होने पर जोखिम को केवल आनुवंशिक कारणों से समझना सही नहीं होगा.

अन्य जोखिम कारकों पर काम करना जरूरी

NIDDK के मुताबिक, फैमिली हिस्ट्री, उम्र और आनुवंशिक/वंशानुगत कारकों को बदला नहीं जा सकता, लेकिन वजन और शारीरिक गतिविधि जैसे कई अन्य जोखिम कारकों पर काम किया जा सकता है. यानी यदि परिवार में डायबिटीज है तो आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश है—जेनेटिक जोखिम को बदला नहीं जा सकता, लेकिन उसके ऊपर जुड़ने वाले कई लाइफस्टाइल रिस्क को कम किया जा सकता है.

किन संकेतों पर डायबिटीज की जांच करानी चाहिए?

टाइप-2 डायबिटीज लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के भी रह सकती है. इसलिए केवल लक्षण आने का इंतजार करना सही रणनीति नहीं है. सीडीसी के अनुसार, कई लोगों को शुरुआत में पता ही नहीं चलता कि उनका ब्लड शुगर बढ़ा हुआ है.

  • बार-बार पेशाब आना – ब्लड शुगर बहुत बढ़ने पर शरीर अतिरिक्त ग्लूकोज को पेशाब के जरिए बाहर निकालने की कोशिश करता है, जिससे बार-बार पेशाब आने की समस्या हो सकती है.
  • बहुत ज्यादा प्यास लगना – बार-बार पेशाब जाने के कारण शरीर में पानी की कमी हो सकती है और लगातार प्यास महसूस हो सकती है.
  • वजन कम होना – बिना डाइट या एक्सरसाइज में बदलाव के वजन तेजी से कम होना भी हाई ब्लड शुगर का संभावित संकेत हो सकता है.
  • लगातार थकान – ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं के लिए प्रमुख ऊर्जा स्रोत है. डायबिटीज में ग्लूकोज का इस्तेमाल ठीक से न हो पाने पर थकान महसूस हो सकती है.
  • धुंधला दिखाई देना – ब्लड शुगर में बदलाव आंखों की दृष्टि को अस्थायी रूप से प्रभावित कर सकता है.
  • घाव भरने में देरी या बार-बार संक्रमण – कुछ लोगों में हाई ब्लड शुगर के साथ संक्रमण की समस्या या घाव भरने में परेशानी भी देखी जा सकती है.

ब्लड शुगर को बढ़ने से कैसे रोकें?

मैयोक्लीनिक के अनुसार, ब्लड शुगर को बढ़ने से रोकने के लिए आपको लाइफस्टाइल और डाइट में बदलाव करने की सलाह दी जाती है.

  • शुगरी ड्रिंक्स का सेवन कम करें.
  • नियमित रूप से एक्सरसाइज और मेडिटेशन करें.
  • पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं.
  • रोजाना रात में करीब 6 से 8 घंटे की नींद लें.
  • तनाव को दूर करें.
  • बाहर का जंक फूड या तला भूना खाना बंद करें और घर की हेल्दी डाइट को अपनाएं.
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