विकास की कीमत चुकाएंगे 143 घर! 750 लोगों पर बेघर होने का संकट, अदालत के आदेश से बढ़ी चिंता

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Shalimar Bagh Road Widening Demolition: देश की राजधानी दिल्ली में एक बार फिर विकास और विस्थापन के बीच टकराव सामने आया है. शालीमार बाग गांव की मुख्य सड़क को चौड़ा करने की योजना अब उन परिवारों के लिए बड़ी चिंता बन गई है, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगाकर यहां अपने घर बनाए थे. दिल्ली उच्च न्यायालय के सख्त निर्देश के बाद प्रशासन ने कार्रवाई तेज कर दी है, लेकिन इस योजना की कीमत 143 मकानों और 157 परिवारों को चुकानी पड़ सकती है. जिन घरों में लोग वर्षों से रह रहे थे, वे अब टूटने की कगार पर हैं.

जाम से राहत या अपनों से दूरी?

शालीमार बाग गांव की यह मुख्य सड़क लंबे समय से जाम का केंद्र बनी हुई है. सड़क इतनी संकरी है कि यहां वाहनों का दबाव लगातार बना रहता है और पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है. स्थानीय लोगों और प्रशासन के लिए यह समस्या वर्षों से बनी हुई थी. कई बार आपात सेवाओं को भी जाम में फंसना पड़ता था, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती थी.

मामला अदालत तक पहुंचने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने जनहित को प्राथमिकता देते हुए स्पष्ट आदेश दिया कि सड़क को चौड़ा किया जाए, ताकि यातायात और आपात सेवाओं का आवागमन सुचारू हो सके. अदालत के आदेश के बाद प्रशासन ने सड़क के दोनों ओर बने निर्माणों को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

750 लोगों के भविष्य पर संकट

प्रशासन द्वारा तैयार सूची में 143 मकानों को चिन्हित किया गया है. इन मकानों में रहने वाले करीब 750 लोगों की जिंदगी पर सीधा असर पड़ने वाला है. इन परिवारों में छोटे बच्चे, पढ़ने वाले छात्र और बुजुर्ग शामिल हैं, जो वर्षों से इन घरों में रह रहे हैं. प्रभावित लोगों का कहना है कि उन्होंने पाई-पाई जोड़कर अपने आशियाने बनाए थे.

अब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर उनके घर टूट गए, तो वे अपने परिवार के साथ कहां जाएंगे. तपती गर्मी और बढ़ते किराए के बीच नया ठिकाना ढूंढना उनके लिए बेहद मुश्किल हो गया है.

पुनर्वास के दावे और जमीनी सच्चाई

एक तरफ सरकार ‘जहां झुग्गी वहां मकान’ और ‘किसी को बेघर नहीं होने देंगे’ जैसे नारे बुलंद करती है, वहीं दूसरी तरफ शालीमार बाग की इन गलियों में रहने वाले लोगों को फिलहाल कोई ठोस वैकल्पिक ठिकाना नहीं दिख रहा है. शहरी योजनाकारों (Urban Planners) का भी तर्क है कि विकास की ऐसी किसी भी बड़ी परियोजना को शुरू करने से पहले प्रभावित लोगों के पुनर्वास (Rehabilitation) की पुख्ता योजना लागू होनी चाहिए. बिना किसी विकल्प के लोगों को सड़कों पर लाना न केवल अमानवीय है, बल्कि यह विकास के मूल ढांचे पर भी सवालिया निशान लगाता है.

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