New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस के मामले में बडा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर शिकायत में कंपनी को ही आरोपी नहीं बनाया गया है, तो सिर्फ डायरेक्टर के खिलाफ दायर चेक बाउंस का मामला कानून की नजर में नहीं टिकेगा. अदालत ने कहा कि जिस कंपनी के खाते से चेक जारी हुआ है, उसे भी मुकदमे में पक्षकार बनाना जरूरी है. ऐसा नहीं होने पर पूरी शिकायत ही खारिज की जा सकती है.
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया. हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से कहा था कि वह खुद कंपनी को भी मामले में आरोपी बना ले. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ऐसा निर्देश नहीं दे सकता. अदालत ने माना कि शिकायत में शुरू से ही कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया था, इसलिए उसमें एक गंभीर कानूनी कमी थी और बाद में उसे जोड़कर उस कमी को दूर नहीं किया जा सकता.
कंपनी को सेवाएं दी थीं
मामला 5 लाख रुपये के एक चेक से जुड़ा था. शिकायतकर्ता का कहना था कि उसने कंपनी को सेवाएं दी थीं, जिसके बदले कंपनी पर 5 लाख रुपये बकाया थे. कंपनी की एक डायरेक्टर और अधिकृत हस्ताक्षर करने वाली महिला ने उसी रकम का चेक जारी किया. लेकिन बैंक ने चेक यह कहते हुए लौटा दिया कि भुगतान रोक दिया गया है. इसके बाद शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन भुगतान नहीं हुआ. फिर चेक बाउंस कानून के तहत मामला दर्ज कराया गया और अदालत ने डायरेक्टर को तलब कर लिया.
हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया
जब केस की सुनवाई आगे बढ़ रही थी, तब आरोपी महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उनका कहना था कि चेक उनके निजी खाते से नहीं, बल्कि कंपनी के खाते से जारी हुआ था. ऐसे में अगर कंपनी को आरोपी ही नहीं बनाया गया है, तो सिर्फ उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चल सकता. हाईकोर्ट ने उनकी दलील नहीं मानी और कहा कि ट्रायल कोर्ट बाद में कंपनी को भी आरोपी बना सकता है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस सोच को गलत बताया और कहा कि शुरुआत से ही कंपनी का मुकदमे में शामिल होना जरूरी था.
कानून की नजर में अलग कानूनी इकाई
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कंपनी एक ज्यूरिस्टिक पर्सन यानी कानून की नजर में अलग कानूनी इकाई होती है. कंपनी का अपना बैंक खाता होता है और अगर उसी खाते से चेक जारी हुआ है, तो चेक बाउंस होने पर सबसे पहले जिम्मेदारी कंपनी की बनती है. इसलिए कंपनी को आरोपी बनाए बिना सिर्फ डायरेक्टर या हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती. अदालत ने अपने पुराने अनीता हाडा फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि यही कानून पहले से तय है.
अधिकारी के खिलाफ दर्ज
इस फैसले का असर हजारों चेक बाउंस मामलों पर पड़ सकता है. खासकर उन मामलों में, जहां शिकायत सिर्फ कंपनी के डायरेक्टर या साइन करने वाले अधिकारी के खिलाफ दर्ज की गई है और कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया. अब ऐसे मामलों में अदालत पहले यह देखेगी कि कंपनी मुकदमे का हिस्सा है या नहीं. अगर नहीं है, तो शिकायत खारिज होने की संभावना बढ़ जाएगी. यानी चेक बाउंस के मामलों में अब सिर्फ चेक पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति को नहीं, बल्कि कंपनी को भी कानून के दायरे में लाना जरूरी होगा.
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