West Asia Crisis: कतर हमले का असर भारत तक, हीलियम संकट से महंगा हुआ MRI, मरीजों पर बढ़ा बोझ

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Helium Shortage MRI India: पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव का असर अब स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने लगा है. कतर के प्रमुख औद्योगिक शहर रास लाफान पर हुए हमले ने वैश्विक सप्लाई चेन को झटका दिया है. यह क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी प्रोसेसिंग और निर्यात केंद्रों में गिना जाता है, जहां से तरल हीलियम का उत्पादन भी जुड़ा हुआ है. इस हमले के बाद भारत समेत कई देशों में लिक्विड हीलियम की आपूर्ति बाधित हो गई है, जिसका सीधा असर मेडिकल सेवाओं पर देखने को मिल रहा है.

हीलियम संकट से दोगुनी हुई कीमत

लिक्विड हीलियम, एमआरआइ मशीनों के संचालन के लिए बेहद जरूरी गैस है. सप्लाई रुकने के कारण इसकी कीमतों में भारी उछाल आया है. एमआरआइ इंस्टालेशन से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, जो गैस कुछ दिन पहले तक करीब 1200 रुपये प्रति लीटर मिल रही थी, अब उसकी कीमत 2300 से 2400 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है.

MRI जांच हुई महंगी, मरीजों पर असर

हीलियम महंगा होने का असर सीधे मरीजों की जेब पर पड़ रहा है. कई निजी डायग्नोस्टिक केंद्रों पर एमआरआइ जांच की फीस बढ़ा दी गई है. जहां पहले ब्रेन एमआरआइ 3500 से 4000 रुपये में हो जाता था, वहीं अब इसकी कीमत 4500 से 5000 रुपये तक पहुंच गई है. इसका असर सरकारी और रियायती दर पर सेवाएं देने वाले मेडिकल कॉलेजों पर भी पड़ा है. मुरादाबाद स्थित एक मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमआरआइ के लिए वेटिंग पीरियड 2-3 दिन से बढ़कर 10-15 दिन तक पहुंच गया है.

मशीनों की तकनीक भी बनी वजह

विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक 3-टेस्ला (3T) एमआरआइ मशीनें ज्यादा हीलियम का उपयोग करती हैं, जिससे उनकी ऑपरेशन लागत बढ़ जाती है. इसी वजह से कई निजी लैब अब 1.5-टेस्ला मशीनों को प्राथमिकता दे रही हैं, जो कम हीलियम में काम कर सकती हैं. हालांकि, 3T मशीनों की इमेज क्वालिटी बेहतर मानी जाती है.

क्यों जरूरी है लिक्विड हीलियम?

डॉक्टरों के मुताबिक, लिक्विड हीलियम एमआरआइ मशीन के सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट्स को बेहद कम तापमान (लगभग -269 डिग्री सेल्सियस) पर बनाए रखता है. यह तापमान जरूरी होता है ताकि मैग्नेट में विद्युत प्रतिरोध खत्म हो सके और मजबूत चुंबकीय क्षेत्र तैयार हो सके. इसी प्रक्रिया के जरिए शरीर की सटीक इमेजिंग संभव होती है.

सप्लाई संकट से आगे बढ़ सकती है समस्या

एक सामान्य थर्ड जनरेशन एमआरआइ मशीन को सालभर में करीब 1200 लीटर लिक्विड हीलियम की जरूरत होती है. हालांकि, नई तकनीक की कुछ मशीनें ऐसी भी हैं जिनमें बार-बार गैस रिफिल की जरूरत नहीं पड़ती. फिलहाल, वैश्विक तनाव के चलते सप्लाई कब तक सामान्य होगी, यह साफ नहीं है. ऐसे में आने वाले दिनों में एमआरआइ और महंगा हो सकता है और मरीजों को और परेशानी झेलनी पड़ सकती है.

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