New Delhi: बांग्लादेश में हो रहे 13वें आम संसदीय चुनाव पर भारत की भी नजर है. यह चुनाव सिर्फ बांग्लादेश की सत्ता तय नहीं करेगा बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों की भविष्य दिशा भी तय करेगा. भारत को आशंका है कि यदि BNP और जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आती है तो ढाका की विदेश नीति में झुकाव बदल सकता है.
भारत-विरोधी तत्वों को खुली छूट
अतीत में BNP-जमात शासन के दौरान भारत-विरोधी तत्वों को खुली छूट, सीमा पार आतंकवाद और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों को लेकर गंभीर आरोप लगते रहे हैं. चुनाव के बाद अल्पसंख्यकों की सुरक्षा भी भारत के लिए एक बड़ा मुद्दा है. अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों की बात करें तो हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों की घटनाएं बढ़ीं.
भारत के सबसे भरोसेमंद पड़ोसियों में रहा ढाका
यह विषय भारत-बांग्लादेश संबंधों में संवेदनशील बिंदु बना हुआ है. शेख हसीना के शासनकाल में ढाका भारत के सबसे भरोसेमंद पड़ोसियों में रहा लेकिन अब सत्ता परिवर्तन की संभावना ने चीन और पाकिस्तान के लिए नए अवसर खोल दिए हैं. चीन पिछले एक दशक से बांग्लादेश में बंदरगाह, बुनियादी ढांचा और रक्षा सौदों के जरिए अपनी पैठ बढ़ाता रहा है.
ढाका-बीजिंग रिश्ते और गहरे
यदि नई सरकार भारत से दूरी बनाती है तो ढाका-बीजिंग रिश्ते और गहरे हो सकते हैं, जिससे बंगाल की खाड़ी में चीन की मौजूदगी मजबूत होगी, वहीं पाकिस्तान के लिए यह चुनाव रणनीतिक वापसी का अवसर माना जा रहा है. अतीत में BNP-जमात शासन के दौरान भारत-विरोधी तत्वों को कथित तौर पर संरक्षण मिला था. भारत को आशंका है कि सत्ता संतुलन बदला तो पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा चुनौतियां फिर उभर सकती हैं.
क्षेत्र में चीन की मौजूदगी और बढ़ सकती है
रणनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि नई सरकार भारत से दूरी बनाती है तो क्षेत्र में चीन की मौजूदगी और बढ़ सकती है, जो भारत की सुरक्षा चिंताओं को गहरा कर सकती है. हालांकि BNP नेता तारीक़ रहमान ने चुनाव प्रचार के दौरान बांग्लादेश फर्स्ट और न्यायपूर्ण राजनीति की बात कही है लेकिन भारत यह देखना चाहता है कि सत्ता में आने के बाद उनका रुख व्यावहारिक रूप से कैसा रहता है.
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