रूस ने एक बार फिर भारत को भरोसा दिलाया है कि तेल सप्लाई को लेकर किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि रूस हमेशा भारत के ऊर्जा हितों का ध्यान रखेगा और दोनों देशों के बीच तेल व्यापार जारी रहेगा।
भारत को तेल सप्लाई की चिंता नहीं करनी चाहिए : सर्गेई लावरोव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान युद्ध की वजह से पेट्रोल-डीज़ल का इस्तेमाल कम करने की अपील के बाद रूस फिलहाल खुलकर कह रहा है कि भारत को तेल सप्लाई की चिंता नहीं करनी चाहिए। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा है कि “भारत के हितों को नुकसान नहीं होने देंगे” और रूस अपने ऊर्जा समझौते पूरे करेगा।
पीएम मोदी ने 10 मई को ईरान युद्ध का हवाला देते हुए पेट्रोल-डीज़ल के साथ ही खाद्य तेल का भी उपयोग कम करने और सोना कम ख़रीदने की अपील की थी. प्रधानमंत्री ने कहा था, “भारत के इंपोर्ट का बहुत बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल है और दुर्भाग्य से जिस क्षेत्र से दुनिया के बड़े हिस्से को तेल मिलता है आज वही क्षेत्र संघर्ष और युद्ध में उलझा हुआ है इसलिए जब तक हालात सामान्य नहीं होते, हम सबको मिलकर छोटे छोटे संकल्प लेने होंगे.
रूसी विदेश मंत्री ने भारत और रूस के संबंधों को लेकर खुलकर बात की
14-15 मई को दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में शामिल होने से पहले एक इंटरव्यू में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत और रूस के संबंधों को लेकर खुलकर बात की
कुछ वैश्विक ताकतें भारत और रूस के संबंधों को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही : लावरोव
लावरोव ने कहा, “जो लोग रूस-भारत दोस्ती के भविष्य को लेकर चिंता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, मुझे लगता है उन्हें चिंता नहीं करनी चाहिए… कुछ वैश्विक ताकतें भारत और रूस के संबंधों को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन उनकी ये कोशिशें सफल नहीं होंगी.”
रूसी विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और रूस के संबंध भारत की आज़ादी के समय से ही क़ायम हैं. उन्होंने कहा, “भारत की आज़ादी के बाद लंबे समय तक कोई भी पश्चिमी देश भारत की सैन्य क्षमता विकसित करने में मदद करने के लिए तैयार नहीं था. रूस ने भारत को न सिर्फ़ हथियार उपलब्ध कराए बल्कि कई तरह के हथियारों के उत्पादन के लिए तकनीक भी साझा की.”
“हमने ब्रह्मोस मिसाइल से शुरुआत की, फिर कलाश्निकोव मशीनगनों तक पहुंचे और अब टी‑90 टैंक भी भारत में बनाए जा रहे हैं.”
उन्होंने आगे कहा कि पिछले साल रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने दीर्घकालिक आर्थिक सहयोग की योजना पर सहमति बनाई, जिसमें सैन्य‑तकनीकी सहयोग भी शामिल है.
भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़ी
भारत अपनी कुल ज़रूरतों का लगभग 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है. यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से भारी मात्रा में रियायती तेल ख़रीदना शुरू किया था, जिससे भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़ती चली गई. जुलाई 2024 तक भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर 44.6 फ़ीसदी तक पहुंच गई थी. हालांकि, अमेरिकी दबाव और टैरिफ नीतियों के कारण जनवरी 2026 तक यह घटकर 20.6% रह गई.
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या भारत बिना किसी रुकावट के रूसी तेल खरीदता रह पाएगा? इसका जवाब है — हाँ, लेकिन पहले जितना आसान नहीं रहेगा।
इसके पीछे तीन बड़ी वजहें हैं:
- भारत की ऊर्जा ज़रूरत
भारत अपनी जरूरत का बहुत बड़ा हिस्सा आयात करता है। रूस से मिलने वाला तेल अक्सर सस्ता पड़ता है, इसलिए भारत उसे छोड़ना नहीं चाहता। यही वजह है कि नई दिल्ली लगातार कहती रही है कि वह अपने “राष्ट्रीय हित” के हिसाब से तेल खरीदेगी।
- पश्चिमी प्रतिबंध और दबाव
अमेरिका और यूरोप रूस की तेल कमाई कम करना चाहते हैं। इसलिए रूसी कंपनियों, टैंकरों और “shadow fleet” पर लगातार प्रतिबंध बढ़ रहे हैं। इससे भुगतान, बीमा, शिपिंग और बैंकिंग मुश्किल हो जाती है।
- भारत का संतुलन
भारत पूरी तरह रूस पर निर्भर भी नहीं होना चाहता। हाल की रिपोर्टों में आया कि भारत ने कुछ अमेरिकी-प्रतिबंधित रूसी LNG कार्गो लेने से मना किया, ताकि सेकेंडरी सैंक्शंस का जोखिम न बढ़े। यानी भारत तेल तो खरीद रहा है, लेकिन हर डील में सावधानी बरत रहा है।
अभी की स्थिति में भारत के पास तीन विकल्प साथ-साथ चल रहे हैं:
रूस से डिस्काउंट वाला तेल खरीदना,
मध्य-पूर्व और दूसरे देशों से सप्लाई बनाए रखना,
और अमेरिका/यूरोप से रिश्ते भी खराब न होने देना।
यही कारण है कि भारत ने अभी तक रूसी तेल खरीदना बंद नहीं किया है, और निकट भविष्य में पूरी तरह बंद करने की संभावना भी कम दिखती है। लेकिन अगर पश्चिमी प्रतिबंध और सख्त हुए या भुगतान-शिपिंग चैनल ज्यादा बाधित हुए, तो खरीदारी की मात्रा और तरीका बदल सकता है।