Ayatollah Ali Khamenei: इस समय ईरान की हवा में मातम पसरा हुआ है. हर ओर लाल- काले झंडे लहरा रहे हैं, जिसमें शोक, शहादत और बदले की भावना सनी हुई है. लाखों लोगों का हुजूम सड़कों पर है. पूरा देश अली अयातुल्लाह को आखिरी विदाई दे रहा है. यह मौका केवल 37 साल तक शासन करने वाले अयातुल्लाह को आखिरी सलाम देने का नहीं, बल्कि उन्हीं की नींव पर नए अयातुल्लाह की कुर्सी को मजबूत करने का भी है. इस पूरी कवायद में धार्मिक और राजनीतिक संदेशों को बढ़ावा देने के लिए गहरे प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
यह मैसेंजिग सिर्फ ईरानी लोगों के लिए नहीं, उन विदेशी हुकूमतों के लिए भी है, जिन्होंने हमला करके देश के सबसे ताकतवर चेहरे को मौत के घाट उतार दिया था.
पोस्टर, बैनर और मैसेंजिग
दरअसल, 1979 की क्रांति के बाद से ईरान में इस्लामिक सरकार है और अभी यह अपने सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रही है. 28 फरवरी को अमेरिकी हमले से पहले ईरान में विद्रोह मचा हुआ था. आर्थिक परेशानी से जूझती जनता सड़क पर थी. वहीं, हमले में पहले ही दिन ईरान ने अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को खो दिया. रिवोल्यूशनरी गार्ड से लेकर कैबिनेट तक, कोई ऐसा महकमा नहीं था, जिसके बड़े लीडर ने जान न गंवाई हो. इसके बाद भीषण जंग की शुरुआत हो गई.
वहीं, जंग के बाद ‘अमेरिका से न हारने’ का तमगा लेकर दुनिया के सामने ईरान ने अपना सैन्य कद बढ़ा लिया है. अब बारी है ईरानी जनता के बीच एकता का नैरेटिव बनाने की. जो अयातुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार ने मौका दिया. सोच-समझकर तैयार किए गए सरकारी नारों से लेकर ईरान की सड़कों पर लगे बैनर-पोस्टर तक, कई तरह के संदेशों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
खामेनेई की मौत पर शोक मनाना एक राष्ट्रीय कर्तव्य
ईरान के अधिकारियों ने बार-बार अपने बयानों में खामेनेई की शहादत पर जोर दिया है. उन्होने अपनी जनता के सामने इस बात को मजबूती से रखा कि खामेनेई की मौत पर शोक मनाना एक राष्ट्रीय कर्तव्य है. खामेनेई के अंतिम संस्कार समारोहों में नारा लगाया जा रहा कि “हमें उठना होगा”. इस नारे को ईरान में शोक मनाने वाले लोगों के हाथों में मौजूद बैनरों और तस्वीरों पर देखा जा सकता है. यह बात अरब देशों को भी समझ में आए, इस मकसद से “अल्लाह के लिए खड़े हो जाओ” नारे का अरबी ट्रांसलेशन चुना गया है. ये दोनों ही नारे कुरान की एक आयत पर आधारित हैं, जो मुसलमानों को अल्लाह के मकसद के लिए एक साथ खड़े होने का आह्वान करती है.
पार्थिव शरीर को ले जाने वाला रास्ता भी एक संदेश
इसके अलावा, खामेनेई के जनाजे में उनके पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए जो रूट चुना गया है, उसका भी एक संदेश है. यह रूट ईरान की राजधानी तेहरान के दक्षिण में स्थित शियाओं के पवित्र शहर कोम से शुरू होकर इराक के नजफ और कर्बला तक जाता है. आखिर में यह यात्रा ईरान के मशहद में इमाम रजा की दरगाह पर उनके दफन के साथ खत्म होगी.
ईरान के पहले सुप्रीम लीडर रुहोल्लाह खोमैनी के सम्मान में बनी ‘ग्रैंड मोसाल्ला’ से ही अंतिम संस्कार के कार्यक्रमों की शुरुआत हुई थी. इस फैसले को भी क्रांति के बाद के ईरान की दो सबसे अहम हस्तियों को आपस में जोड़ने के तरीके के तौर पर देखा जा रहा है. यानी कुल मिलाकर शियाओं के एकजुट करने के साथ-साथ सुप्रीम लीडर की कुर्सी अभी भी पवित्र और ताकतवर है, इस मैसेज को दुनिया के सामने रखा जाएगा. जैसे-जैसे करोड़ों लोगों का हुजूम इस जनाजे में शामिल होगा, मौजूदा सुप्रीम लीडर के तौर पर अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई की ताकत मजबूत होती जाएगी.