होर्मुज जंग में बहरीन भी कूदा, रूस-चीन के डर से अचानक बदला प्लान! अब संशोधित प्रस्ताव पर कराएगा वोटिंग

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New Delhi: स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज पर चल रही जंग के बीच अब बहरीन भी इसमें कूद गया है. इस समुद्री रास्ते से होने वाले व्यापार पर सबसे अधिक निर्भर देशों में से एक बहरीन अपनी सुरक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र के मैदान में उतर आया, लेकिन चीन के घुसते ही एक ट्व‍िस्‍ट आ गया. बहरीन ने पहले तो ईरान के खिलाफ सीधे एक्शन की तैयारी की थी, पर रूस और चीन के वीटो वाले डर ने उसे अपना प्लान बदलने पर मजबूर कर दिया है.

ड्राफ्ट में UN चार्टर के चैप्टर VII का हवाला

बहरीन ने शुरुआत में जो प्रस्ताव तैयार किया था, वह बेहद सख्त था. उस ड्राफ्ट में UN चार्टर के चैप्टर VII का हवाला दिया गया था. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ‘चैप्टर VII’ का मतलब होता है- आर-पार की लड़ाई. अगर कोई प्रस्ताव इस चैप्टर के तहत पास हो जाता है, तो संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों को उस इलाके में प्रतिबंध लगाने या सीधे सैन्य कार्रवाई करने का कानूनी अधिकार मिल जाता है.

ड्राफ्ट को US और अन्य खाड़ी देशों का पूरा समर्थन

बहरीन का इरादा साफ था. ईरान द्वारा अमेरिका और इजरायल के साथ जारी संघर्ष के बीच व्यापारिक जहाजों पर हो रहे हमलों को हर हाल में रोकना. इस ड्राफ्ट को अमेरिका और अन्य खाड़ी देशों का पूरा समर्थन हासिल था. भले ही बहरीन ने ‘चैप्टर VII’ हटा दिया हो, लेकिन उसने चतुराई से एक्शन वाली भाषा को बरकरार रखा है. नए ड्राफ्ट में कहा गया है कि देश अकेले या मिलकर परिस्थितियों के अनुसार सभी जरूरी उपाय कर सकते हैं.

पूरे खाड़ी क्षेत्र पर लागू होगा यह नियम

देश मिलकर एक समुद्री गठबंधन बना सकते हैं जो जहाजों की पहरेदारी करेगा. अगर कोई देश अंतरराष्ट्रीय नेविगेशन में बाधा डालता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी. यह नियम केवल होर्मुज ही नहीं, बल्कि ओमान की खाड़ी और पूरे खाड़ी क्षेत्र पर लागू होगा. होर्मुज का यह संकरा समुद्री रास्ता कोई मामूली रास्ता नहीं है. दुनिया की कुल तेल सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) यहीं से गुजरता है.

जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले आम

ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी तनाव के कारण यहाँ स्थिति ऐसी हो गई है कि शिपिंग लगभग ठप है. जहाजों पर ड्रोन और मिसाइल हमले आम हो गए हैं. अगर यह जलमार्ग बंद होता है, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें रातों-रात आसमान छू लेंगी, जिसका असर हर देश की जेब पर पड़ेगा. राजनयिकों के मुताबिक, बहरीन इस संशोधित प्रस्ताव को इसी गुरुवार को वोटिंग के लिए ला सकता है.

बहरीन के लिए यह अपने अस्तित्व की लड़ाई

अब सवाल यह है कि क्या रूस और चीन इस भाषा पर सहमत होंगे या वे अभी भी इसे ईरान को घेरने की पश्चिमी देशों की चाल मानकर ठुकरा देंगे? बहरीन के लिए यह केवल कूटनीति नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की लड़ाई है, क्योंकि उसकी पूरी अर्थव्यवस्था इसी जलमार्ग की सुरक्षा पर टिकी है.

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