ट्रंप को बड़ा झटका, ब्राजील में चुनाव से पहले US अधिकारियों की एंट्री बैन, राष्ट्रपति का विरोध पडा भारी

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New Delhi: ब्राजील और अमेरिका के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है. ब्राजील के विदेश मंत्रालय ने शनिवार को अमेरिकी विदेश मंत्रालय के ट्रंप प्रशासन के उन दो अधिकारियों के वीजा आवेदन खारिज कर दिए हैं जो अगले सप्ताह ब्राजील की यात्रा पर आने वाले थे. यह मामला तब सार्वजनिक हुआ जब द वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक खबर में कहा कि ब्राजील सरकार का कहना है कि अमेरिकी अधिकारी. सहायक विदेश मंत्री राइली एम. बार्न्स और उप सहायक मंत्री सैमुअल सैमसन, अक्टूबर में होने वाले ब्राजील के आम चुनावों की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करना चाहते थे.

जबरन श्रम को रोकने में विफल

अमेरिका सरकार का आरोप है कि ब्राजील अनुचित व्यापार प्रतिस्पर्धा करता है और जबरन श्रम को रोकने में विफल रहा है. लूला सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह कदम चुनाव में सीनेटर बोल्सोनारो के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश है. ब्राजील के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया कि बार्न्स और सैमसन ने 20 जुलाई को वीजा के लिए आवेदन किया था जिसे शुक्रवार को अस्वीकार कर दिया गया. हालांकि, उन्होंने वीजा खारिज किए जाने का कारण नहीं बताया.

ट्रंप के प्रशासन से करीबी संबंध

ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा फिर से चुनाव लड़ रहे हैं और उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी सांसद फ्लावियो बोल्सोनारो हैं जिनके परिवार के अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन से करीबी संबंध रहे हैं. फ्लावियो बोल्सोनारो और उनके भाई एडुआर्डो बोल्सोनारो ने मई के अंत में वॉशिंगटन जाकर राष्ट्रपति ट्रंप समेत अमेरिकी अधिकारियों से मुलाकात की थी.

दो सबसे बड़े मादक पदार्थ तस्करी गिरोह

इसके कुछ ही समय बाद ट्रंप प्रशासन ने ब्राजील के दो सबसे बड़े मादक पदार्थ तस्करी गिरोह ‘फर्स्ट कमांड कैपिटल’ और ‘रेड कमांड’ को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया. राष्ट्रपति लूला ने इस फैसले का विरोध किया था. ट्रंप प्रशासन ने ब्राजील से आने वाले हजारों उत्पादों पर अधिकतम 37.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क भी लागू कर दिया, जो शुक्रवार से प्रभावी हो गया.

ब्रासीलिया यात्रा की योजना

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कहा कि बार्न्स और सैमसन की 27 से 30 जुलाई के बीच ब्रासीलिया यात्रा की योजना थी. इस दौरान वे सरकारी अधिकारियों, धार्मिक नेताओं और अन्य लोगों से ‘चुनावी निष्पक्षता’, धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर चर्चा करने वाले थे.

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