ब्रिटेन की जेलों में AI का होगा पहरा, कैदियों में माइक्रोचिप लगाने की भी तैयारी, मानवाधिकार संगठन चिंतित

London: ब्रिटेन की जेलों में कैदियों की निगरानी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और अन्य अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग पर विचार किया गया है. यहां तक कि कुछ तकनीकी कंपनियों ने कैदियों की त्वचा में माइक्रोचिप लगाने का सुझाव भी दिया है, जिससे उनकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सके. वहीं इन प्रस्तावों ने मानवाधिकार संगठनों और निजता के समर्थकों की चिंता बढ़ा दी है.

गोपनीयता पर गंभीर प्रश्न

उनका कहना है कि यदि कैदियों के शरीर में माइक्रोचिप लगाने जैसी तकनीकें लागू की जाती हैं, तो इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवाधिकार और गोपनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं. बता दें कि यह चर्चा पिछले वर्ष ब्रिटेन के जेल मंत्री James Timpson (लॉर्ड टिम्पसन) और प्रमुख टेक कंपनियों के प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठक में हुई थी. बैठक में Amazon, Google और Microsoft जैसी बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल थे.

समाज के लिए कितना खतरा

बैठक में यह विचार रखा गया कि एआई की मदद से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कौन-से अपराधी भविष्य में समाज के लिए कितना खतरा पैदा कर सकते हैं. समर्थकों का दावा है कि इससे अपराध की रोकथाम और सार्वजनिक सुरक्षा को मजबूत किया जा सकेगा. यह बैठक पिछले वर्ष हुई थी, लेकिन इसकी जानकारी अब सार्वजनिक हुई है. तकनीक के संभावित दुरुपयोग पर नजर रखने वाले संगठन Foxglove ने सूचना के अधिकार कानून के तहत बैठक से जुड़े दस्तावेज प्राप्त किए, जिसके बाद इन चर्चाओं का खुलासा हुआ.

रोबोटिक्स के उपयोग पर भी चर्चा

बैठक के दौरान जेलों में कैदियों की आवाजाही के लिए रोबोटिक्स के उपयोग पर भी चर्चा हुई. प्रस्तावों में कैदियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों के इस्तेमाल और एआई आधारित जोखिम मूल्यांकन प्रणाली विकसित करने की बात शामिल थी. तकनीक समर्थकों का तर्क है कि जेलों में बढ़ती भीड़, सुरक्षा चुनौतियों और अपराध नियंत्रण की जरूरतों को देखते हुए उन्नत तकनीकों का उपयोग भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

फिलहाल प्रस्ताव स्वीकार नहीं

ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया गया है. ये केवल विचार-विमर्श और संभावित भविष्य की तकनीकों से जुड़े सुझाव हैं, जिन पर अभी कोई आधिकारिक नीति नहीं बनी है.

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